जाने क्या है पूरा भारत – चीन सीमा विवाद

पड़ोसियों को परेशान करने और अपनी विस्तारवादी नीति को लेकर चीन को हमेशा से ही दुनिया की आलोचनाएं झेलनी पड़ती रहीं हैं । इसके बावजूद भी चीन की इन हरकतों में कमी के बजाय तेज़ी ही देखने को मिलती रहती हैं ।

  • मई महीने से ही भारत और चीन की सेना बॉर्डर पर आमने सामने है ।
  • इससे पहले भी साल 2017 में डोकलाम में दोनों सेनाएं 73 दिनों तक सामने में डटी रही थी ।

एक तरफ़ जहां दुनिया कोरोना से जंग लड़ रही है तो वहीँ चीन भारत के साथ सीमा पर तनाव बढ़ाने पर लगा हुआ है। इसका उदाहरण गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प की घटना हैं । वहीं सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर भी चीन की ओर से गतिविधियां देखने को मिली है । मई महीने से ही भारत और चीन की सेना बॉर्डर पर आमने सामने है। इसे लेकर अमरीका और रूस जैसे कई देशों ने दोनों देशों को बातचीत से मामला हल करने की सलाह दी है ।

सीमा पर चीनी घुसपैठ और तनाव का यह पहला मामला नहीं हैं। इससे पहले भी साल 2017 में डोकलाम में दोनों सेनाएं 73 दिनों तक सामने में डटी रहीं थी। और भी कई बार छोटे स्तर पर ये समस्या सामने आती रहती थीं । लेकिन इस बार गलवान में हुई घुसपैठ और हिंसक झड़प चीन के ख़तरनाक इरादों की ओर इशारा करती है ।

कारण —  सीमा पर बार बार होने वाली इस घुसपैठ का कारण चीनी विस्तारवादी नीति तो है ही। साथ ही साथ भारत और चीन के बीच सीमा निर्धारण न होना भी इसका एक कारण माना जाता है । 1962 के भारत चीन युद्ध के बाद दोनों देशों की यथास्थिति को एलएसी की संज्ञा दी गई थी। लेकिन इसके बाद भी चीन की ओर से बार – बार घुसपैठ की घटनाएं सामने आती रहती हैं ।

ऐतेहासिक रूप से दोनों देशों के बीच अब तक 3 बार सीमा निर्धारित हो चुकी है । 1865 में जॉनसन लाइन , 1893 में मैकडोनाल्ड लाइन और आख़िरी बार 1914 में मैकमोहन रेखा का निर्धारण हुआ है । लेकिन चीन मैकमोहन रेखा को नकारता रहा है । इस कारण अब तक दोनों देश सीमा निर्धारण पर एकमत नही हो पाए हैं । भारत अक्साई चीन पर चीन का अवैद्य कब्ज़ा बताता आया है । तो वहीँ चीन सिक्किम , अरुणाचल आदि कई क्षेत्रों पर अपना दावा करता है और उन्हें चीन का भाग बताता है ।

जानकारों की माने तो वर्तमान में सीमा पर चीनी आक्रामकता का कारण भारत द्वारा बॉर्डर पर तेज़ी से होते निर्माण कार्य और दुनिया व दक्षिण एशिया में बढ़ता भारतीय प्रभुत्व है । हाल ही में भारत सरकार द्वारा FDI की नई नीति से भी चीन को झटका लगा है । इसके अलावा कोरोना वायरस के आरोपों से घिरा चीन इन हरकतों से दुनिया का ध्यान भटकाना चाहता है ।

आगे — दोनों देशों के बीच हालिया तनाव का अंदाजा सीमा पर बड़ी संख्या में सेना की तैनाती से लगाया जा सकता है । भारत ने सीमा पर किसी भी स्थिति से निबटने के लिए पूरी तैयारी शुरू कर दी है । वहीँ दूसरी ओर दोनों देशों के मंत्री और अधिकारियों के बीच बातचीत का दौर भी शुरू है । ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही दोनों देश तनाव को ख़त्म करेंगे । क्योंकि भारत और चीन के बीच किसी भी तरह का संकट पूरी दुनिया के लिए संकट का रूप ले सकता है ।

वक्त है अब बदलाव का

 

इन दिनों पूरी दुनिया में श्रम सुधारों को लेकर अलग – अलग विद्वानों व समूहों द्वारा आवाजें उठाई जा रही है। ऐसे में भारत भी इसमें सुधार कर के दुनिया में एक अग्रणी भूमिका निभा सकता है। अब वक्त आ गया है कि हम अपनी जनता से काम करवाएं ना की मजदूरी।

कुछ समय पहले देश की संसद ने न्यूनतम मजदूरी बिल पास किया । इसे सरकार अपनी बड़ी उपलब्धि बता रही है , वहीँ कई संगठन और विद्वानों ने इस बिल में कई खामियां बताई हैं जिनमें सुधारों की आवश्यकता है ।

इस बिल में चार पुराने श्रम कानूनों- पेमेंट ऑफ वेजेस एक्ट (1936), मिनिमम वेजेस एक्ट (1948), पेमेंट ऑफ बोनस एक्ट (1965) और समान पारिश्रमिक एक्ट (1976) को शामिल किया गया है ।

कई मजदूर संगठन इस बिल का इसलिए भी विरोध कर रहें हैं। क्योंकि इस बिल के अनुसार मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी दर 178 रुपए प्रतिदिन और 4628 रूपए प्रतिमाह तय है। जो कि देश में एक आम इंसान के तथा उसके परिवार के दैनिक या मासिक जरूरतों तथा खर्च को देखते हुए काफ़ी कम प्रतीत होता है।
वहीं अगर देश के संगठित क्षेत्र की नौकरियों पर भी नज़र डालें तो वहां भी कई समस्या हैं। आम तौर पर कंपनियों द्वारा 8 घण्टे के बजाए 9 से 10 घंटे तक काम लिया जाना , और तो और घर से भी काम करवाने की शिकायतें रहती हैं ।
लोग अपनी क्षमता से ज्यादा काम की वजह से लगातार किसी न किसी बीमारी का शिकार होते चले जा रहे हैं। वहीँ इन दिनों काम के दवाब में कई कामगारों की मौत की भी ख़बरें प्रकाश में आईं हैं ।

कुछ वर्ष पहले भारतीय चिकित्सा शोध परिषद (आईसीएमआर) की एक शोध में पता चला कि भारत के लगभग 19.7 करोड़ लोग किसी न किसी मानसिक रोग से ग्रसित हैं। ऐसा बिल्कुल कह सकते हैं कि इनमें एक बड़ा हिस्सा कामगारों का भी है ।

अगर हम इन समस्याओं के समाधान की बात करें की तो कई उपाय हैं ,जैसे कि देश में श्रम कानून मजदूर संगठंनो के साथ चर्चा कर के बनाएं व सुधारें जाएं।
कुछ अन्य उपायों की बात करें तो एक बड़ा दूरगामी उपाय यह भी है कि देश में कार्य दिवस की संख्या सप्ताह में 4 दिन और कार्य के घंटे 8 से घटाकर 6 घंटे तक कर दिया जाएं ।

आज हमारी सरकारें युवा पीढ़ी को लगातार समाज में योगदान देने को प्रोत्साहित कर रही हैं । ऐसे में अगर कार्य के दिन और अवधी कम कर दिएं जाएं तो सरकार की ये पहल काफी असरदार हो सकती है । वहीँ अगर सरकार कंपनियों के साथ मिलकर यह पहल शुरू करें की हफ्ते में एक दिन उनके कर्मियों को समाज में अपना कुछ योगदान देना हैं । वो कार्य कुछ भी हो उदाहरण स्वरूप पौधरोपण , स्वच्छता , गरीब मुहालों में स्वास्थ्य शिक्षा तथा स्थितियों का निरीक्षण आदि। वहीं कर्मियों के उत्साहवर्धन के लिए उन्हें उनके काम के लिए बोनस तथा अन्य उपहार भी दिएं जाएं ।

हाल ही में जापान में माइक्रोसॉफ्ट कंपनी ने अपने कर्मचारियों के लिए हफ्ते में 4 दिन कार्य का नियम रखा। इसके परिणामस्वरुप कर्मचारियों की उत्पादकता में 41 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी देखी गई। इस उदाहरण से कंपनियों को घाटा होने की समस्या का समाधान भी प्राप्त होता है। क्योंकि अगर उत्पादकता बढ़ती है तो कंपनी का मुनाफा भी निश्चित है।

आज देश लगातार वैश्विक ख़ुशी सूचकांक में नीचे चला जा रहा है। बेरोजगारी समस्या बढ़ रही है, कामगारों को वेतन काफ़ी कम मिल रहा है। लोग अपने परिवार को खुद को काफी कम समय दे पा रहे हैं , समाज के प्रति जवाबदेही कम हो रही है। ऐसी स्थिति में अगर सरकार उपरोक्त सुधारों को लागू करती है तो निश्चित ही यह एक बड़ा और कारगर सुधार माना जाएगा। और अगर यह सुधार भारत जैसे देश द्वारा लाया जाए तो यह कदम पूरी दुनिया में एक बड़ा बदलाव ला सकता है। शायद वक़्त आ गया है कि भारत विश्वगुरु बन कर दुनिया को यह मार्ग दिखाए की अपने लोगो को किस तरीके से एक बेहतर जीवन दिया जा सकता है ।

नएं आयाम गढ़ रहें हैं भारत – अमरीका के रिश्तें

 कभी दशकों तक राजनितिक रूप से एक दूसरे के छद्म विरोधी रहे भारत व अमरीका के संबंध आज नए आयाम पर हैं ।

  • 2019 – 20 में दोनों देशों के मध्य 68 B $ का कारोबार हुआ है।
  • अमरीका द्वारा भारत का जीएसपी का दर्जा ख़त्म कर दिया गया है।

भारत का सोवियत संघ के प्रति झुकाव रहा हो या पोखरण परमाणु परीक्षण के वक्त भारत पर लगाये प्रतिबंध। या फ़िर अमरीका का पाकिस्तान के प्रति झुकाव । इन सभी मुद्दों ने भारत व अमरीका के बीच हमेशा ही दूरियां बना कर रखीं थी । लेकिन 2006 में दोनों देशों के बीच हुए परमाणु समझौते के बाद से लेकर अब तक संबंधो में व्यापक परिवर्तन आया है ।

दोनों देशों के मध्य सैन्य क्षेत्र की भागीदारी की बात करें तो हाल में भारत ने अमरीका से चिनूक , अपाचे , रोमियो जैसे हेलीकॉप्टर ख़रीदे हैं । दोनों देशों के बीच 2 + 2 वार्ता भी हुई है तथा समय समय पर दोनों देश युद्धाभ्यास भी करते रहें हैं ।

आर्थिक क्षेत्र की बात करें तो आज अमरीका भारत के सामान के लिए दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार बन गया है। 2019 – 20 में दोनों देशों के मध्य 68 B $ का कारोबार हुआ है। भविष्य में दोनों देश मुक्त व्यापार समझौते पर भी विचार कर रहे हैं ।

इसके अलावा राजनितिक कूटनीतिक क्षेत्र की बात करें तो दोनों देश JAI ( जापान अमरीका इंडिया ) , quad ( भारत अमरीका जापान ऑस्ट्रेलिया ) आदि समूह में भागीदार हैं । इसके अलावा अमरीका UN की स्थायी सीट , NSG में सदस्यता व G – 7 में भारत को भागीदार बनाने के लिए मदद कर रहा है । हिन्द प्रशांत क्षेत्र में चीन के प्रभुत्व को रोकने के लिए भी दोनों देश साथ आ रहें हैं । चाहे अमरीका में हाउडी मोदी कार्यक्रम हो या भारत में नमस्ते ट्रम्प इन सब ने दोनों देशों को करीब लाने का काम किया है ।

वहीँ वर्तमान समय में covid महामारी से राहत में भी दोनों देशों ने जम कर भागीदारी की है ।

अमरीका ने कश्मीर से 370 हटाने के मामले में भी भारत का साथ दिया है । दोनों देशों के संबंधों का अंदाज़ा राष्ट्रपति ट्रम्प के इस बयान से लगाया जा सकता है कि – ‘भारत को व्हाइट हाउस में आज तक मुझसे अच्छा दोस्त नहीं मिला होगा’ ।

लेकिन दोनों देशों के बेहतर संबंधों की राह में कई चुनौतियां भी है, जो समय – समय पर दिखती रहती हैं । हाल मेंअमरीका द्वारा भारत का जीएसपी का दर्जा ख़त्म करना , भारतीय वस्तु पर टैक्स बढ़ाना जैसी समस्या देखने को मिली हैं । वहीँ अमरीका से बढ़ते संबंधों के मध्य रूस , ईरान जैसे पुराने मित्र देशों से भविष्य में दूरियां बढ़ने का भी ख़तरा है । इस कारण भारत को इन सब के मध्य सामंजस्य स्थापित करने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ सकती है ।

370 के खात्मे के 1 साल और कश्मीर का भविष्य

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देश के कुछ सबसे पुराने विवादित मुद्दो मे से एक अनुच्छेद 370 के हटाएं जाने के 1 साल से ज्यादा का समय हो गया है ।

  • देश की संसद ने 5 अगस्त 2019 को 370 को निष्क्रिय कर दिया गया था ।
  • 370 के प्रावधानों के समाप्त होते ही अनुच्छेद 35(अ) भी स्वतः ही समाप्त हो गया ।

घटनाक्रम –  1947 मे राजा हरि सिंह ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किया था । इसके 2 वर्षों बाद 1949 में संविधान में 360(अ) जोड़ा गया जो आगे चलकर अनुच्छेद 370 बना । यह जम्मू और कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करता था । इसके तहत राज्य को अलग झण्डा , अलग संविधान व केन्द्र के कानूनो को लागू करने न करने जैसे कई अधिकार मिलते थे ।

इसे देश की संसद द्वारा 5 अगस्त 2019 को निष्क्रिय कर दिया गया था । जम्मू – कश्मीर को केन्द्रशासित प्रदेश तथा लद्दाख को भी राज्य से अलग करके एक नया केन्द्रशासित प्रदेश बनाया गया । अनुच्छेद 370 के प्रावधानो के समाप्त होते ही अनुच्छेद 35(अ) भी स्वतः ही समाप्त हो गया।  यह 370 का ही एक हिस्सा था जो राज्य को इसके स्थाई व अस्थाई नागरिकों के बीच भेद करने का अधिकार देता था । इसे साल 1952 मे राष्ट्रपति के एक अध्यादेश मात्र से संविधान में सम्मिलित किया गया था।  इस कारण यह अनुच्छेद शुरु से ही विवादो मे था ।

लोगों की राय – अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय किए जाने के विषय पर इसके पक्ष व विपक्ष में अपनी – अपनी राय हैं ।
कुछ लोग इसे देश को जम्मू – कश्मीर से जोड़ने वाला पुल व उनका हक़ बताया । उन्होनें इस कदम को उनके साथ धोखे की संज्ञा दी। तो वहीं कई लोग इस कदम को ऎतेहासिक बता रहें हैं । उनके अनुसार यह अनुच्छेद छल से लागू किया हुआ व अलगाववाद को बढावा देने वाला था । गौरतलब है कि इसे लागू करते समय संविधान संशोधन की प्रक्रिया नहीं अपनाई गयी थी ।
इसे राज्य में आतंकवाद , भ्रष्टाचार व पिछड़ेपन का प्रमुख कारण भी माना जाता रहा था । इस अनुच्छेद के कारण राज्य में RTI , CAG , आरक्षण , पंचायती राज जैसी कई योजनाएं  लागू नहीं थी। इस कारण अन्य राज्यों के मुकाबले ज्यादा फण्ड मिलने के बावजूद भी राज्य पिछड़ेपन व अलगाववाद का शिकार बना रहा।  इसी कारण राज्य में निवेश भी लगभग शून्य ही रहा ।

वर्तमान परिस्थिती और भविष्य – अनुच्छेद 370 के समाप्ति के बाद से राज्य में विकास कार्यौं मे तेजी शुरु हुई है । अमूल और कई अन्य कंपनियों ने हजारों करोड़ के निवेश का भी ऐलान किया है । लेकिन इन कार्यों कि राह मे अब भी कश्मीर में सक्रिय मिलीटेंट बड़ी चुनौती हैं। मुठभेड की खबरें अब भी आए दिन आती रहती हैं ।

कश्मीर मे स्थिरता लाने के लिए आज तक कई प्रयास किएं गएं। इसका पहला उदाहरण खुद 370 ही था। इसके बाद की सरकारों की तमाम कोशिशें हो या स्व. वाजपेयी जी की कश्मीरीयत – जम्हूरीयत और इंसानियत की नीति। या वर्तमान प्रधानमंत्री की गोली नहीं गले लगाने की नीति। इनमें से कोई भी कश्मीर मे स्थाई शांति लाने मे कामयाब साबित नहीं हुएं हैं। इसके बाद इस नए कदम से उम्मीदें लगाई जा रहीं हैं । 370 के हटने के बाद सरकार को राज्य मे अपनी योजनाएं लागू करने मे भी आसानी मिल चुकी हैं।  लेकिन अब भी राज्य मे एक ऐसा वर्ग है जो 370 हटने से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है । उन्हे साथ लाने की जरुरत है । क्योकि यह एक लम्बी प्रक्रिया होगी इसलिए सरकार को अब कश्मीर में विकास व विश्वास की एक नई नीति के साथ कार्य करने की ज़रुरत है। जिससे कश्मीर मे जारी अशांती का दौर ख़त्म हो और राज्य का भविष्य उज्जवल हो सके ।

मध्यपूर्व मेें भारत का मजबूत साझेदार है UAE

एक अरसे से चले आ रहे भारत और यूएई के संबंध आज अपने सबसे बेहतर स्वरूप मे दिखाई पड़तें हैं । यूएई की जनसंख्या मे लगभग 25 लाख की आबादी भारतीय मूल के लोगों की है। इनका योगदान यूएई संपन्न बनाने मे काफ़ी महत्वपूर्ण माना जाता रहा है ।

  • यूएई ने भारत को रेसिप्रोकल कंट्री का दर्जा दिया है ।
  • यूएई ने भारत में 75 B $ के निवेश करने का वादा किया है ।

भारत और यूएई कूटनीतिक – राजनैतिक एवं व्यापारिक सभी रुप से साथ – साथ आगे बढ़ते दिखतें हैं । भारत को OIC में आमंत्रण , UN मे समर्थन , 370 पर साथ और पीएम मोदी को अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान देना इसका उदाहरण है । यूएई मे भारतीयों के लिए मंदिर खुलवाना व कई मौकों पर देश की इमारतों को भारतीय रंगों मे रंग देना सांस्कृतिक मेल को बढ़ावा देता है । यूएई ने भारत को रेसिप्रोकल कंट्री का दर्जा भी दिया है जिसके अनुसार अब वहां की न्यायालयों के कुछ फैसले भारत में भी लागू होंगे ।

दोनों देशो के व्यापारिक रिश्तों की बात करें तो इनके बीच 2019 तक व्यापार 60 B $ तक पहुंच गया है।  भविष्य में भी यूएई ने भारत में 75 B $ का निवेश करने का वादा किया है । भारत अपनी जरूरत का 8 % तेल यूएई से मंगाता है और यहां रहने वालें भारतीय लोग भारत के विदेशी मुद्रा कोष में बड़ा योगदान देते है । हाल ही में यूएई भारतीय रुपे कार्ड को मंजूरी देने वाला तीसरा देश बन गया है ।

पश्चिमी एशिया मे यूएई जैसा साथी भारत के लिये काफी माएनें रखता हैं। हाल ही में OIC  की बैठक में भारत को घेरने की पाकिस्तान की कोशिशों को भी यूएई ने झटका दे दिया था । इन सब के अलावा कोविड-19 के संकट में भी भारत ने यूएई को दवाईयां तथा नर्स भेजकर मदद की है। वहीं यूएई ने भी भारत को PPE-KIT भेज कर मदद की है ।

लेकिन दोनो देशों के रिश्तों की राह मे कई चुनौतियां भी हैं । भारत की छवि दुनिया में एक धर्मनिरपेक्ष देश की है लेकिन CAA , दिल्ली दंगे व बढ़ती मुस्लिम विरोधी घटनाएं दोनों देशों के रिश्तों मे दरार पैदा कर सकती हैं ।  भारत को जल्द से जल्द ऐसे कदम उठाने की जरुरत है जिससे ये समस्याएं दूर हो सकें ।

यूएस – तालिबान वार्ता और अफ़गानिस्तान का भविष्य ।।

करीब दो दशकों से अफ़गानिस्तान की धरती पर जारी ख़ून – खराबा अब धीरे धीरे ही सही लेकिन शांति की ओर बढ़ता दिखाई पड़ रहा है । पिछले दिनों मार्च के महीने में क़तर में 10 वें US – Taliban शांति वार्ता का आयोजन हुआ। इसमें 50 देशों ने हिस्सा लिया । भारत की ओर से क़तर में राजदूत पी. कुमारन भी इसमें शामिल हुए थें ।

  • 2001 में हुए 9/11 हमले के आरोपियों को अमरीका को न सौंपने के जवाब में 2003 में अमरीका व नाटो सेनाओं ने अफगानिस्तान पर हमला बोल दिया था ।
  • भारत ने अफ़गानिस्तान के विकास के लिए अरबों का निवेश कर रखा है जिस पर ख़तरा आ सकता हैं ।

अमेरिका के लिए लगभग सिरदर्द बन चुके अफ़गानिस्तान में जारी हिंसा व वहां फंसे अमरीकी व सहयोगी देशों के सैनिकों की घर वापसी के नज़रिए से यह वार्ता काफ़ी महत्वपूर्ण मानी जा रही है ।

इतिहास — 2001 में हुए 9/11 हमले के आरोपियों को अमरीका को न सौंपने के जवाब में 2003 में अमरीका व नाटो सेनाओं ने अफगानिस्तान पर हमला बोल दिया था । अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज़ तालिबान की सेना 1 हफ़्ते में ही युद्ध हार गई थी । उनमें से कई मारें गएं व कइयों ने पाकिस्तान भागकर और पर्वतों में छुपकर अपनी जान बचाई ।

लेकिन समय बीतने के साथ – साथ अमरीका का ध्यान ईरान की ओर गया। इसके अलावा अमरीकी – अफ़गानी सैनिकों के दमनकारी नीतियों के कारण तालिबान अपनी शक्ति को वापस जुटाने में कामयाब रहा । वर्तमान में अफगानिस्तान के आधे या उससे ज्यादा भाग पर तालिबान का कब्ज़ा है । उसे वहां अच्छा खासा समर्थन भी प्राप्त है । देश में तालिबान और अफ़गान सेना के बीच लम्बे समय से संघर्ष ज़ारी है ।

पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के शासन में भी शांति स्थापित करने की कई कोशिशें की गई थी। जिसका उदाहरण दोहा मे स्थित राजनयिक मिशन भी है । इसके अलावा इसी दौरान अफ़गानिस्तान में काम्बैट मिशन को बंद करवा कर केवल अफ़गान सेना को ट्रेनिंग देने का फ़ैसला भी लिया गया था । अफ़गानिस्तान से अमरीकी सैनिकों की सकुशल वापसी राष्ट्रपति ट्रम्प के प्रमुख चुनावी वादों में से एक था ।

वार्ता की शर्तें – इस वार्ता के अनुसार अगर तालिबान देश में शांति स्थापित कऱता है तो शुरु के 135 दिनों में अमरीका अपनी फौज़ की संख्या 14000 से कम कर के 9600 कर देगा । वहीं अगले 14 महीनों मे पूरी अमरीकी सेना वापस चली जाएगी । इसके बदले मे तालिबान किसी भी आतंकी गतिविधि मे शामिल नहीं होगा । न ही अफ़गानिस्तान की ज़मीन को इसके लिए प्रयोग होने देगा। गौरतलब है कि ISIS की बढती सक्रियता से अमरीका , रुस व स्वयं तालिबान भी चिंतित हैं ।

भारत का पक्ष – भारत हमेशा से ही अफ़गानिस्तान में शांति का पक्षधर रहा है। लेकिन इस पूरी वार्ता पर भारत ने चिंता भी ज़ाहिर की है । भारत अफ़गानिस्तान मे लोकतंत्र का बड़ा समर्थक रहा है। लेकिन इस वार्ता में अफ़गानिस्तान सरकार को शामिल ना किए जाने , महिलाओं की आज़ादी, खेल व संस्कृति आदि बातों पर स्थिति साफ़ न होने पर भारत ने सवाल उठाएं हैं। भारत ने अफ़गानिस्तान के विकास के लिए अरबों का निवेश कर रखा है जिस पर ख़तरा आ सकता है ।

भविष्य – इस वार्ता से ऊपरी तौर पर शांति तो दिखती है लेकिन अब भी इसमे कई कमियाॅं हैं। तालिबान द्वारा अफ़गानिस्तान की चुनी हुई सरकार को मान्यता न देना , लोकतंत्र की स्थिति साफ़ न करना भविष्य के लिए बुरे संकेत है। इन सभी समस्याओं को जल्द से जल्द सुलझाया जाना चाहेिए ।

 

फ़ेक एनकाउंटर की समस्या और भारत

 

कुछ महीनों पहले हैदराबाद पुलिस द्वारा बलात्कार के आरोपियों के एनकाउंटर का मामला अभी ठंडा नही हुआ था कि उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा “विकास दूबे ” के एनकाउंटर ने एक बार फिर से देश में अपराध न्याय प्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं ।

  • मानवाधिकार आयोग के अनुसार साल 2015 से मार्च 2019 तक देश में 211 फ़ेक एनकाउंटर की रिपोर्ट सामने आई है ।
  • आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के अनुसार देश के न्यायलयों में लगभग 3.5 करोड़ मामले लंबित थें ।

एक अपराधिक मामलें की जांच में पहुंची यूपी पुलिस पर हुई अचानक गोलीबारी में एक डीएसपी सहित 8 पुलिसवालों की मौत हो गई थी । इसके बाद हुई पुलिस कार्यवाही में एक – एक कर के “विकास दूबे ” सहित 6 अपराधियों की मौत पुलिस एनकाउंटर में हो गई । लेकिन देखने वाली बात यह रही की इन सभी एनकाउंटर के कारण पुलिस ने लगभग एक समान दिए । जैसे हिरासत से भागना फायरिंग करना और आत्मरक्षा ही , जिससे इन पर सवाल खड़े हो रहें हैं । गौरतलब है कि हैदराबाद तथा अन्य कई एनकाउंटर में भी कारण लगभग यही देते जाते रहें हैं । इनमें से ज्यादातर जांचों में आखिर में पुलिस को क्लीनचिट ही मिली है ।

हमेशा की तरह इस बार भी कई लोग इसे फ़ेक एनकाउंटर तथा मावधिकार के उल्लंघन बता रहे हैं। तो वहीं कोई लोग इसकी सराहना कर रहें हैं तथा इसे उचित न्याय बता रहें हैं । लेकिन विरोध और सराहना के सबसे बड़ा प्रश्नचिन्ह देश की न्याय प्रणाली पर लगा है । जन सराहना के हिसाब से की जा रही कार्यवाही ने देश की न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल खड़े किएं हैं ।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार साल 2015 से मार्च 2019 तक देश में 211 फ़ेक एनकाउंटर की रिपोर्ट सामने आई हैं । इसके अलावा देश ने पहले भी कई फ़ेक व विवादित एनकाउंटर केस देखें हैं। उदाहरण स्वरूप 2006 का लखन भैया एनकाउंटर केस । इन सब कारणों की वजह से देश रूल ऑफ़ लॉ इंडेक्स में 126 देशों में भारत का स्थान 68वां हैं ।

कारण -:

जानकारों की माने तो इन फ़ेक एनकाउंटर के पीछे जन सराहना की एक बड़ी भूमिका होती है । इसका प्रमुख कारण देश की धीमी न्याय प्रणाली को माना जाता है । आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के अनुसार देश के न्यायलयों में लगभग 3.5 करोड़ मामले लंबित थे जो अब तक और ज्यादा होने की उम्मीद है । अपराधियों को सज़ा मिलने में देरी व सरल जमानत प्रावधानों , कम सजा आदि बड़ी समस्या है। इसकी वजह से जनता का भरोसा इन दिनों न्यायलयों से कम होकर त्वरित कार्यवाही पर पर ज्यादा होने लगा है । वहीँ कई पक्ष इसके पीछे की वजह हमेशा किसी राज पर पर्दा डालने को बताते हैं ।

उपाय –:

देश के भीतर बढ़ती एनकाउंटर प्रथा व इसे मिलती जन सराहना खतरे के संकेत देती दिखती है। इसे रोकने के लिए बड़े पुलिस व न्यायिक सुधार किए जाने की आवश्यकता है । वर्तमान में देश में 10 लाख लोगों के ऊपर मात्र 18 जज हैं। जबकि विधि आयोग के अनुसार इस संख्या को 50 होना चाहिए । इसके अलावा जजों के रिक्त पड़े स्थान जो की 23% है उसे भी जल्दी भरने की आवश्यकता है ।

जनता को सिर्फ न्याय नही बल्कि जल्द से जल्द न्याय देने की व्यवस्था होनी चाहिए। क्योंकि न्याय में देरी भी एक तरह का अन्याय ही हैं । वहीं पुलिस कार्रवाई की भी निष्पक्ष जांच की जरूरत है । इसके अलावा ब्रिटिश काल के कानून में बदलाव , न्यायतंत्र पर ज्यादा खर्च (वर्तमान में बजट का 0.08% है) आदि कर के देश के पुलिस तथा न्यायलयों को प्रभावी बनाएं जाने की ज़रूरत है। ताकि जनता का विश्वास न्यायतंत्र पर हमेशा बना रहें ।

भारत नेपाल सीमा विवाद

सांस्कृतिक रुप से शायद ही कोई देश भारत के इतना करीब है जितना की नेपाल । नेपाल मे लोकतंत्र की स्थापना से लेकर भुकम्प में तबाही तथा कोरोना संकट तक भारत ने नेपाल की छोटे भाई की तरह मदद की है । लेकिन साल 2015 मे हुए मधेसी आंदोलन के बाद से दोनो देशों के बीच पड़ी दरार अब और ज्यादा गहरी हो गई है ।

  • नेपाल ने नए नक्शें मे भारत के कालापानी , लिपुलेख और लिंम्पियाधुरा क्षेत्र को अपना बताया है।
  • नेपाल के पीएम के.पी ओली ने भारतीय वायरस , नकली अयोध्या जैसे कई विवादित बयान भी दिए ।

विवाद – नेपाल ने जारी किए गए नए नक्शें मे भारत के कालापानी , लिपुलेख और लिंम्पियाधुरा क्षेत्र को अपना बताया है तथा भारत को यह क्षेत्र खाली करने को कहा है । वहीं भारत ने इस दावे को बेबुनियाद बताया है । यह क्षेत्र भारत के उत्तराखंड के पिथौरागढ़ का हिस्सा है जबकि नेपाल इस पर अपना दावा करता है ।

भारत व नेपाल के बीच यह विवाद  दशकों पुराना है। लेकिन हाल ही में भारत द्वारा जम्मू – कश्मीर संशोधन विधेयक पारित किया गया। इसके बाद भारत द्वारा नया नक्शा जारी करने के बाद नेपाल ने पहली बार इसपर आक्रामक रुप से आपत्ति जताई है ।  नेपाल का कहना है कि कालापानी व अन्य दोनो क्षेत्र विवादित है। इस पर भारत ने जवाब दिया कि ये सभी क्षेत्र हमेशा से ही भारत का हिस्सा हैं और इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है । वहीं भारत द्वारा हाल ही मेंं कालापानी क्षेत्र में 80 km की एक सड़क के निर्माण के बाद यह विवाद और ज्यादा गहरा हो गया है ।

महत्व – कालापानी भारत – चीन – नेपाल के तिराहे पर स्थित एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है । यह महाकाली नदी के तट पर स्थित है ।  नेपाल का दावा है कि 1816 में हुई सुगौलि की संधि के अनुसार काली नदी के पश्चिम मे भारत व पूर्व में नेपाल का क्षेत्र होगा इस कारण इस क्षेत्र पर नेपाल का हक़ है । वहीं इसपर भारत का कहना है कि सुगौलि संधि के बाद भी यह क्षेत्र भारत का हिस्सा रहा है। नेपाल जिसे नदी बता रहा है वह मुख्य नदी की एक धारा है तथा सुगौलि की संधि में इस क्षेत्र के उत्तरी हिस्से का भी निर्धारण नहीं हुआ था ।

इन विवादों के बीच नेपाल ने पहली बार भारत की सीमा के पास सेना की तैनाती की है ।

वहीं नेपाल के पीएम के.पी ओली ने भारतीय वायरस , नकली अयोध्या जैसे कई विवादित बयान भी दिए हैं । जानकारों का मानना है कि के.पी ओली की घटती लोकप्रियता , भारत के नएं मार्ग बनने के बाद होने वाला घाटा और नेपाल मे बढ़ता चीनी प्रभुत्व इस विवाद के पीछे की वजह है ।

समाधान –  हाल ही में नेपाल में आए राजनीतिक संकट के बाद उसने भारत से बातचीत से मामले को सुलझाने की अपील की है । वहीं भारत भी शुरु से ही इसी बात को दोहराता आया है । क्योंकि शायद ये बात दोनों पक्ष जानते और समझते हैं की भारत तथा नेपाल के रिश्तें सरकारों से आगे बढ़कर जनता के बीच के हैं ।

 

 

क्या ख़तरे में है मीडिया एवं अभिव्यक्ती की स्वतंत्रता ?

भारत के संविधान में अनुच्छेद 19 के तहत देश के नागरिकों को लिखित या मौखिक रूप से अपना मत प्रकट करने हेतु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है ।लेकिन वर्तमान समय में अगर हम परिस्थितियों पर ध्यान दें तो पाते हैं कि देश में प्रेस की स्वतंत्रता पर आघात लगातार बढ़ें हैं ।

  • साल 2014 से 2019 के बीच देश के विभिन्न हिस्सों में पत्रकारों पर 198 गंभीर हमलों की ख़बरें आई, जिनमें 40 की मौत हुई हैं ।
  • विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत का वर्तमान स्थान 142वां हैं जबकि पिछले साल ये 140वां था ।

चूँकि देश में पत्रकारिता/मीडिया भी विचारों को साझा करने का एक साधन है। इसलिए इसमें प्रेस की आज़ादी को भी शामिल किया गया है । लेकिन वर्तमान समय में अगर हम परिस्थितियों पर ध्यान दें तो पातें हैं कि देश में प्रेस की स्वतंत्रता पर आघात लगातार बढ़ें है ।

चाहे मीडिया पर सेंसरशिप लगाने का मामला हो या फिर विभिन्न राज्यों में पत्रकारों पर बढ़ते हमले या उनपर बढ़ते राजद्रोह – मानहानि के मुक़दमें। इन सभी ने प्रेस की आज़ादी पर गहरा आघात किया है । समस्या का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गुजरात में एक पत्रकार द्वारा सरकार के संकट में होने की ख़बर छापने पर उसपर राजद्रोह के तहत मुकदमा दर्ज़ किया गया ।

देश में ऐसे एक नहीं बल्कि कई मामले हैं जो हाल ही में सामने आएं हैं, इनमें लगातार वृद्धि ज़ारी है ।
वहीँ इस दौरान पत्रकारों की जान को भी ख़तरे  बढ़ते नज़र आएं हैं । साल 2014 से 2019 के बीच देश के विभिन्न हिस्सों में पत्रकारों पर 198 गंभीर हमलों की ख़बरें आईं जिनमें 40 की मौत हुई है ।

इन्हीं समस्याओं का नतीज़ा है कि विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भी भारत के स्थान में लगातार गिरावट ज़ारी है। भारत का वर्तमान स्थान 142वां है जबकि पिछले साल यह 140वां था ।
इन सब समस्याओं को देखते हुए देश में पत्रकार सुरक्षा कानून को लेकर मांगें लगातार तेज़ हो गई हैं । हरियाणा , महाराष्ट्र , छत्तीसगढ़ व केरल जैसे राज्यों ने इसके लिए प्रावधान भी किएं हैं ।

कई बार अभिव्यक्ती की स्वतंत्रता के मामलों को लेकर दूसरे पक्ष भी सामने आते रहते हैं। कई बार पत्रकारों व मीडिया संस्थानों द्वारा अपनी स्वतंत्रता को लाँघ कर स्वच्छंदता का प्रदर्शन भी सामने आता है। यह कृत्य पत्रकारिता के उसूलों के अनुरूप कतई नहीं है । कई बार सुप्रीम कोर्ट ने भी पित्त पत्रकारिता व प्रेस की आज़ादी जरूरी है पर असीमित नहीं जैसी बातें दोहराई हैं ।

देश में प्रेस कॉउंसिल ऑफ़ इंडिया और व न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन जैसी संस्थाएं विधमान तो हैं लेकिन बहुत सीमित शक्तियां होने के कारण ये निष्प्रभावी ही नज़र आती हैं । इसलिए वर्तमान समय की जरूरत है कि इन्हें शक्तियां देने और प्रभावी बनाने के लिए कदम उठाएं जाएं। इन्हें प्राथमिक स्तर के जाँच व कार्रवाई के अधिकार दिए जाएं । इसके अलावा एक देशव्यापी पत्रकार संरक्षण कानून की व्यवस्था की जाए। जिससे पत्रकार तथा पत्रकारिता दोनों निडर होकर समाज के सरोकार में अपना पूर्ण योगदान दे सकें ।

गरीबों के लिए उम्मीद की किरण है – एक देश एक राशन कार्ड योजना

हरित क्रांति के आगमन के दशकों बाद भारत आज खाद्यान्न के मामले में सरप्लस (खपत से ज्यादा) की स्थिति में है। लेकिन जब हम दुनिया में भुखमरी के मामलों के आंकड़े देखते हैं तो दुनिया में भारत का स्थान 103वां है।

  • अब देश के नागरिक देश के किसी भी हिस्से में अपने हक का राशन प्राप्त कर सकते हैं ।
  • मार्च 2021 तक इसे देश की शत प्रतिशत आबादी तक पहुँचाने का लक्ष्य हैं ।

इस समस्या का मुख्य कारण देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पी.डी.एस सिस्टम ) की खस्ता हालत को बताया जाता रहा है । इसके अलावा कोरोना संकट के इस दौर में प्रवासी नागरिकों को राशन व अनाज की दिक्कतों ने भी सरकार और व्यवस्था का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए हाल ही में सरकार ने देश को “एक देश एक राशन कार्ड योजना ” की सौगात दी है ।

योजना के फायदे

इस योजना के लागू होने के बाद अब देश के नागरिक देश के किसी भी हिस्से में अपने हक का राशन प्राप्त कर सकतें हैं। जबकि इससे पहले उन्हें सिर्फ़ अपने गृह क्षेत्र में ही राशन मिल पाता था। इसकी वजह से देश में अन्य राज्यों में जाकर कार्य करने वाले प्रवासी नागरिकों को समस्या का सामना करना पड़ता था। लेकिन अब इस योजना के आने के बाद से करोड़ों की संख्या में लोगों को लाभ मिलने की उम्मीद हैं ।

प्रक्रिया —

इस योजना के अंतर्गत सरकार ने अगले 3 महीनों में 23 राज्यों के कुल 67 करोड़ लोगों तक लाभ पहुंचाने का लक्ष्य रखा है । वहीं मार्च 2021 तक इसे देश की शत प्रतिशत आबादी तक पहुँचाने का लक्ष्य है । इसके लिए नागरिकों के राशन कार्ड को आधार से जोड़ने का प्रावधान किया गया है । आधार में मौजूद बायोमेट्रिक से लोगों की पहचान करना आसान भी हो जाएगा ।

इसके अलावा सरकार द्वारा प्रवासियों की मदद हेतु 2 वेबपोर्टल की भी शुरुआत की जाएगी। जिसकी मदद से प्रवासियों की संख्या के अनुसार उनके क्षेत्रों तक राशन के वितरण की व्यवस्था की जा सके।

चुनौतियां —

केंद्र सरकार की यह ऐतेहासिक योजना गरीब कल्याण , भूखमरी से मुक्ति , व राशन दुकानदारों द्वारा भ्रष्टाचार के ख़ात्मे के मार्ग में एक बड़ा कदम है। लेकिन इस बड़े कदम की राह में कई चुनौतियां भी हैं –

इस योजना का सबसे महत्वपूर्ण चरण है राज्यों के बीच समन्वय स्थापित करना जिससे राज्यों के बीच कम या ज्यादा राशन के भार को लेकर मतभेद न हो। इसके लिए एक केंद्र – राज्य समिति का निर्माण बेहतर कदम साबित हो सकता है । इसके अलावा देश के कई दूर दराज़ के हिस्सों में अब भी कई लोगों के पास आधार कार्ड उपलब्ध नहीं है। मेहनत करते हुए मजदूरों के हाथ घिस जाने से उनके बायोमेट्रिक को नुकसान पहुंचता है। इससे उनके पहचान में समस्या आ सकती है । वहीं देश में परिवहन व भंडार घर (स्टोरेज) की स्थिति भी बेहतर करने की ज़रूरत है जिससे अनाज़ का नुकसान ना हो पाए।

अगर सरकार उपरोक्त समस्याओं को भी सुलझा लेती है तो गरीब कल्याण के लिए एक नयी उम्मीद की किरण बनी यह योजना बेहतर ढंग से अपने शत प्रतिशत लक्ष्य को प्राप्त करने में कामयाब हो सकती है ।