उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने पीसीएस 2018 के परिणाम किए घोषित, अनुज नेहरा ने किया टॉप

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPSC) ने पीसीएस 2018 के नतीजों की घोषणा कर दी है। कुल 988 पदों के लिए हुई इस भर्ती में 976 अभ्यर्थियों को अंतिम रूप से सफल घोषित किया गया है। पीसीएस 2018 में अनुज नेहरा ने टॉप किया है, जबकि संगीता ने दूसरा और ज्योति ने तीसरा स्थान प्राप्त किया है।

पीसीएस 2018 टॉपर 

रैंक                    नाम                             निवास
1                  अनुज नेहरा                  पानीपत, हरियाणा
2                   संगीता राघव                 गुरुग्राम, हरियाणा
3                   ज्योति शर्मा                   मथुरा, उत्तर प्रदेश
4                   विपिन कुमार                 जालौन, उत्तर प्रदेश
5                  कर्मवीर केशव                 पटना, बिहार

बता दें कि पीसीएस-2018 का इंटरव्यू बीते 25 अगस्त को पूरा हो चुका था, जिसके बाद से ही जल्द परिणाम घोषणा का इंतजार किया जा रहा था। पीसीएस-2019 की मुख्य परीक्षा 22 सितंबर से शुरू होनी है। पीसीएस-2018 की मुख्य परीक्षा इस बार संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा की तर्ज पर आयोजित की गई थी।

मध्यप्रदेश उपचुनाव: कांग्रेस ने जारी की 15 प्रत्याशियों की सूची

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मध्यप्रदेश की 27 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव के लिए कांग्रेस पार्टी ने प्रत्याशियों की पहली सूची जारी कर दी है। इसमें 15 नेताओं को चुनाव मैदान में उतारने का फैसला किया गया है।

उम्मीदवारों की सूची
दिमनी- राघवेंद्र सिंह तोमर
अंबाह (सुरक्षित)- सत्यप्रकाश सिकरवार
गोहद (सुरक्षित)- मेवाराम जाटव
ग्वालियर- सुनील शर्मा
डबरा- सुरेश राजे
भांडेर- फूल सिंह बरैया
करेरा (सुरक्षित)- प्रगीलाल जाटव
बमोरी- कन्हैयालाल अग्रवाल
अशोकनगर- आशा दोहरे
अनूपपुर (सुरक्षित)- विश्वनाथ सिंह कुंजाम
सांची (सुरक्षित)- मदनलाल चौधरी
आगर (सुरक्षित)- विपिन वानखेड़े
हाटपिपल्या- राजवीर सिंह बघेल
नेपानगर  (सुरक्षित)- राम किशन पटेल
सांवेर (सुरक्षित)- प्रेमचंद गुड्डू

गौरतलब है कि 21 अगस्त को चुनाव आयोग ने कोरोना काल में देश में चुनाव कराने को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए थे। इसमें कहा गया था कि उम्मीदवार को नामांकन पत्र, शपथ पत्र और नामांकन से लेकर सिक्योरिटी मनी ऑनलाइन ही जमा करनी होगी।

वहीं, चुनाव कार्य को लेकर सभी व्यक्ति मास्क लगाएंगे। चुनाव से जुड़े हॉल, रूम या परिसर में प्रवेश के दौरान थर्मल स्कैनिंग की जाएगी। वहां सेनिटाइजर, साबुन और पानी की व्यवस्था की जाएगी। सभी को सामाजिक दूरी का पालन करना होगा। घर-घर जाकर पांच लोगों को संपर्क की अनुमति दी जाएगी।

क्या विलुप्त हो जाएंगे अख़बार ?

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2013 में यूएन के बुद्धिजीवी फ्रांसिस गैरी ने कहा था कि दुनिया से 2040 तक अख़बार पूरी तरह विलुप्त हो जाएंगे। ऐसे ही दावे कई बार अन्य लोगों ने भी किये । अगर वर्तमान परिस्थितियों को देखें तो यह बात सच होती नजर आ रही है ।

  • डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रचलन को मुख्यत: जिम्मेदार माना जाता है ।
  • कोरोना संकट में अखबारों के वितरण बंद होने से यह समस्या और प्रभावी हो गई है ।

दुनिया में रेडियो के लगभग समाप्ति के बाद अब पारंपरिक मीडिया के एक और साधन अखबार पर भी बड़ा संकट मंडराने लगा है। इसका मुख्य कारण घटती व्यूअरशिप और डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रभुत्व को बताया जाता है ।

हाल के दिनों में डेक्कन हेराल्ड के संस्करण , डीएनए , डीबी पोस्ट जैसे कई अखबारों के ऊपर ताला लटक गया है। कोरोना संकट में अखबारों के वितरण बंद होने से यह समस्या और प्रभावी हो गई है । वहीँ मीडिया के एक और साधन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के भी कई न्यूज चैनल्स बंद हुए हैं।

देश के भीतर अख़बारों के घटते व्यूअरशिप की बात करें तो दैनिक जागरण ने 2019 के पहली तिमाही के मुकाबले तीसरी तिमाही में अपने 13.6 % रीडर ख़ो दिए। वहीँ हिंदुस्तान अख़बार ने इतने ही समय में 21 % रीडर गंवाएं । अन्य अखबारों का भी हाल कमोबेश ऐसा ही रहा । यह संकट सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के अन्य कई देशों में भी हावी है ।

इस संकट की वजहों कि बात करें तो सबसे पहला और बड़ा कारण डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रचलन को ही माना जाता है । देश दुनिया में इंटरनेट, डिजिटल और सोशल मीडिया की पहुंच , तत्काल तथा कम समय में ख़बर की जानकारी । वो भी एक नही कई प्रकाशनों के द्वारा मिलने से लोग अब अखबारों से दूरी बनाते हुए दिखाई पड़ते हैं । इसके अलावा अख़बारी कागज़ों की बढ़ती कीमत , उनपर ज़्यादा टैक्स , राजस्व में कमी व छपाई में ज्यादा लागत जैसी भी कई समस्याएं हैं ।

जानकारों की माने तो अब भी अख़बारों पर आए इस संकट को रोका जा सकता है । अख़बार वितरण के इंफ्रास्ट्रक्चर को सही कर के और उनकी पहुंच आसान तथा सुदूर क्षेत्रों तक बना कर बिक्री को बढ़ाया जा सकता है । अख़बारी कागज़ो पर टैक्स में कटौती तथा सब्सिडी देकर उनकी आर्थिक रूप से मदद भी की जा सकती है । इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण घटक कंटेंट को बेहतर बनाकर संकट को टाला जा सकता है । क्योंकि डिजिटल मीडिया में फ़ेक न्यूज तथा अन्य कई समस्याएं भी है जो इसे कमज़ोर बनाती हैं।

गौरतलब है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के आगमन के वक्त भी अख़बारों पर संकट की बात आई थी । लेकिन अपने कंटेंट के दम पर ही आज तक यह टिका रहा । अगर उपरोक्त समस्याओं को सुलझा लिया जाए तो अख़बारोँ के ऊपर आए इस संकट को भी टाला जा सकता है ।

Vande Bharat और Humsafar समेत 22 ट्रेनों के लिए शुरू हुआ रिजर्वेशन

वंदे भारत, प्रयागराज-नई दिल्ली हमसफर, प्रयागराज-जयपुर समेत प्रयागराज जंक्शन एवं प्रयागराज छिवकी से शुरू एवं गुजरने वाली 22 ट्रेनों में आज (बृहस्पतिवार) सुबह से यात्री रिजर्वेशन करवा सकेंगे।

बता दें, पिछले दिनों ही सीआरबी वीके यादव ने 12 सितंबर से 40 जोड़ी स्पेशल ट्रेन चलाने का एलान किया था। इन ट्रेनों में से 18 ट्रेनें प्रयागराज एवं चार ट्रेनें प्रयागराज छिवकी के रास्ते गुजरेंगी।

हमसफर, वंदे भारत, प्रयागराज-जयपुर, चौरीचौरा एक्सप्रेस, बुंदेलखंड एक्सप्रेस, गंगा-कावेरी समेत नौ जोड़ी ट्रेनें प्रयागराज जंक्शन के रास्ते चलेंगी। इसी तरह प्रयागराज छिवकी से कुल दो जोड़ी ट्रेनें चलेंगी। इसके पूर्व अनलॉक होने के बाद प्रयागराज जंक्शन से 28 एवं प्रयागराज छिवकी से 12 ट्रेनों का संचालन हो रहा है।

देश में कोरोना की सबसे बड़ी उछाल, पिछले 24 घंटे में 95,735 नए मामले

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देश में कोरोना के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। स्वास्थ्य मंत्रालाय की रिपोर्ट के मुताबिक गुरुवार को एक बार फिर एक दिन में कोरोना संक्रमण के नए मामलों ने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए। गुरुवार को 95,735 नए मामले सामने आए।

इन नए मामलों के साथ देश में कोरोना के मरीजों की संख्या बढ़कर 44 लाख 65 हजार से अधिक हो गई है। लेकिन, राहत की बात यह है कि बीमारी से ठीक होने वाले लोगों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। आंकड़े के अनुसार, अब तक 34 लाख 71 हजार से ज्यादा लोग ठीक हो चुके हैं।

वहीं, पिछले 24 घंटे में 1,172 लोगों की मौत होने से मृतकों की संख्या बढ़कर 75,062 हो गई है। देश में संक्रमण के मामले बढ़कर 44,65,864 हो गए हैं, जिनमें से 9,19,018 लोगों का उपचार चल रहा है और 34,71,784 लोग उपचार के बाद इस बीमारी से उबर चुके हैं।

आत्मनिर्भर भारत और इसकी राह में चुनौतियां

आत्मनिर्भरता का आशय आत्मकेंद्रित होना बिलकुल भी नहीं है बल्कि इसका उद्दश्य देश दुनिया के विकास में भारत के सहयोग को बढ़ावा देना है ।

  • सरकार ने 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज का भी ऐलान किया ।
  • इस पैकेज में RBI द्वारा पूर्व में दिए गए 8 लाख करोड़ रुपये के पैकेज को भी जोड़ा गया है।

कोरोना संकट के बीच पीएम मोदी ने देश की ज़रूरत की सामाग्रियों का निर्माण देश में ही करने पर ध्यान केंद्रित करने का ऐलान किया है। वहीं इनका प्रचार प्रसार कर के इसे वैश्विक स्तर पर पहुंचाने के लिए आत्मनिर्भर भारत अभियान का ऐलान किया है।  दुनिया भर में इनकी पहुंच सुनिश्चित करने के लिए पीएम मोदी ने “ज़ीरो डिफ़ेक्ट – ज़ीरो इफ़ेक्ट ” का मंत्र भी दिया ।

कोरोना संकट और गिरती अर्थव्यवस्था के बीच दुनिया संरक्षणवाद की नीति बढ़ती दिख रही है । इस बीच आत्मनिर्भर भारत अभियान एक मील का पत्थर माना जा रहा है । यूं तो इससे पहले भी कई बार स्वदेशी अपनाने को लेकर प्रचार प्रसार हुआ है लेकिन इस बार इसे बेहतर नीति , क्रियान्वयन और जनता के साथ से आगे बढ़ाने की योजना है ।
इस मुहिम को ध्यान में रखते हुए सरकार ने 20 लाख करोड़ के एक आर्थिक पैकेज का भी ऐलान किया जिसमें शिक्षा , रोज़गार , खनिज , व्यापार व स्टार्टअप आदि पर खास ध्यान दिया गया है । हालांकि इस पैकेज में RBI द्वारा पूर्व में दिए गए 8 लाख करोड़ के पैकेज को जोड़े जाने से सरकार की आलोचना भी हुई है ।

देश में पहले से चली आ रही स्टार्टअप इंडिया , मेक इन इंडिया , स्किल इंडिया व डिजिटल इंडिया आदि योजनाएं भी आत्मनिर्भर भारत अभियान में बड़ा योगदान दे सकती है । इसी बात को ध्यान में रखते हुए इस पैकेज में 3 लाख करोड़ रुपये का हिस्सा सूक्ष्म व लघु उद्योग के लिए रखा गया है । वहीँ नए उद्योगों के लिए भी कोलैटरल लोन की व्यवस्था की गई है ।

चुनौतियां – देश को आत्मनिर्भर बनाने का सपना जितना बड़ा है इसकी राह में चुनौतियां भी उतनी ही बड़ी नज़र आती हैं – देश में कुशल कामगारों , बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर , नई तकनीकों की भारी कमी हैं । कंपनी शुरू करने में लालफ़ीताशाही , बढ़ते fdi , विदेशी वस्तुओं के विकल्प और कच्चे माल की कमी भी एक बड़ी समस्या है । इसके अलावा पूर्ववर्ती योजनाओं को भी सही तरीके से क्रियान्वयन कर के उन्हें परिणामोन्मुखी बनाने की आवश्यकता है। जिससे आत्मनिर्भर भारत अभियान में ये अपना पूर्ण योगदान दें सकें ।
उपरोक्त समस्याओं को सुलझाकर व अपनी बड़ी युवा आबादी का बेहतर ढंग से इस्तेमाल कर के भारत आत्मनिर्भर बनने की ओर एक बड़ी छलांग लगा सकता है । साथ ही विश्व के विकास में अपना बड़ा योगदान दे सकता है ।

कैसी होगी कोरोना संकट के बाद की दुनिया ??

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1945 में ख़त्म हुए द्वितीय विश्व युद्ध की त्रासदी के बाद दुनिया पहली बार कोरोना जैसी भयानक त्रासदी से गुज़र रही है। इसलिए ये साफ़ है कि इस त्रासदी के बाद दुनिया में फिर से कई बड़े राजनैतिक आर्थिक व सामाजिक बदलाव देखने को मिलने वाले हैं ।

  • पूरी दुनिया में 29,442,256 केस आ चुकें हैं जिनमें 932,744 लोगों को मौतें हुई हैं ।
  •  यूएन में परिवर्तन व सुधारों की मांगे तेज़ हो गई हैं ।

कोरोना महामारी के अब तक पूरी दुनिया में 29,442,256 केस आ चुके हैं। इन में अब तक 932,744 लोगों को मौतें हुई हैं । इस संकट के कारण होने वाले आर्थिक व राजनैतिक प्रभाव की बात करें तो दुनिया में बड़े स्तर पर भूखमरी , बेरोज़गारी जैसी समस्याएं देखने को मिल सकती है। गौरतलब है कि विभिन्न अनुमानों के मुताबिक इस संकट से वैश्विक GDP को लगभग 9 ख़रब डॉलर तक का नुकसान होने की उम्मीद है ।

इसके अलावा दुनिया में अब वैश्वीकरण के ठीक उलट संरक्षणवाद देखने को मिल सकता है । इसका सबसे बड़ा उदाहरण भारत द्वारा आत्मनिर्भर भारत अभियान के रूप में देखा जा सकता है।

वहीं चीन के ख़िलाफ़ एक तरह की मोर्चेबंदी देखने को मिल सकती है। यह ट्रेड वार से काफ़ी बड़ी होने की उम्मीद है। भारत , ब्रिटेन, अमरीका समेत कई अन्य देशों द्वारा चीनी कंपनी हुवाई जैसी कई कंपनियों , चीनी सामानों के ऊपर टैक्स – प्रतिबन्ध और चीनी एप्स पर प्रतिबंध ने इस बात को सही साबित करना शुरू कर दिया है।

चीन के ख़िलाफ़ कई देशों की गोलबंदी के बाद एक छोटे स्तर के शीत युद्ध शुरू होने की आशंका से भी इंकार नही किया जा सकता । इसका सबसे सटीक उदाहरण भारत – चीन के बीच चल रहा संघर्ष और दक्षिण चीन सागर में सैन्य तैनाती से लगाया जा सकता है ।

इस संकट के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ में भी कई परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं, अमरिका का WHO से बाहर होना । इसके चीन समर्थित होने के आरोपों ने इस विवाद को और गहरा कर दिया है।

गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने ही द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दुनिया को संभालने में एक बड़ी भूमिका अदा की थी। इसलिए इस बार कोरोना संकट के बाद भी यही उम्मीद की जा रही है। लेकिन वर्तमान में इसमें परिवर्तन व सुधारों की मांगे तेज़ हो गयी हैं। हाल ही में पीएम मोदी ने भी इस बात को कई देशों के समक्ष उठाया है ।

वहीं अगर कोरोना संकट से होने वाले सामाजिक प्रभावों की बात करें तो दुनिया में नस्लवाद , भेदभाव व उदारीकरण के खात्मे जैसे असर देखने को मिल सकते हैं । इसका उदाहरण कई देशों में दक्षिण एशियाई लोगो के साथ हो रहे भेदभाव व भारत में भी जमाती मामले से लगाया जा सकता है ।

इसके अलावा शिक्षा के क्षेत्र में अब डिजिटल एजुकेशन का बड़ा दौर आ सकता है। तो वहीँ स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़े सुधार व पर्यावरण को लेकर सचेतना जैसी कई चीजें भी देखने को मिल सकती है । जिससे भविष्य में ऐसे किसी भी संकट से बचा जा सके ।

क्या निजता के प्रति सजग हो रही है जनता ?

वर्तमान में इंटरनेट व सोशल मीडिया के इस दौर में समाज के कई मुद्दों के समूह में निजता नाम का मुद्दा बार बार सामने आता रहता है ।व्रतमान में इसे लेकर जनता व सरकारें दोनों सजग आने लगी है ।

  • 2016 के अमरीकी चुनावों में कैम्ब्रिज एनालिटीका के दख़ल के बाद से मामला गर्म है ।
  • भारत में सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में निजता को अनु. 21A के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया था ।

2016 के अमरीकी चुनावों में कैम्ब्रिज एनलिटीका नाम की संस्था द्वारा फेसबुक से यूजर का डेटा खरीद कर चुनावों को प्रभावित किया था। इस बात के सामने आने के बाद से पूरी दुनिया में निजता पर बहस ज़ारी है । आम लोगों को अब इस बात का एहसास हो रहा है कि उनके बैंक तथा मोबाइल पासवर्ड के अलावा भी कई ऐसे डाटा और निजी जानकारियां हैं जिनका गलत इस्तेमाल हो रहा है ।

कंपनियों द्वारा यूजर का सर्विलांस कर के उनकी पसन्द – नापसन्द , निजी फैसलों तक को प्रभावित किया जा सकता है । भारत में भी समय समय पर आधार , सोशल मीडिया और वर्तमान में आरोग्य सेतु एप पर भी निजता हनन के आरोप लगाएं जाते हैं ।

भारत में सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में निजता को अनु. 21A के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया था । हाल ही में आधार को सोशल मीडिया से जोड़ने की खबर से भी निजता पर बहसबाजी शुरू हुई थी । इसे लागू करने से सरकार ने इंकार कर दिया है ।

विश्व के कई देशों ने निजता उल्लंघन के ख़िलाफ़ कड़े प्रावधान किएं हैं जिनमें इ.यू , दक्षिण कोरिया जैसे कई देश शामिल हैं । अमरीका में भी कानून की व्यवस्था की गई है लेकिन ये इतने कड़े नही हैं ।भारत में भी जानकार निजता के लिए कड़े कानूनों की मांग करते रहते हैं।

भारत सरकार का कहना है कि वो देश के लोगों की निजता की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है । इसी का असर देखा जा सकता है कि अब सरकार व देश की कंपनियों ने देश के लोगों का डाटा देश के बाहर न जाने देने की कोशिशें तेज़ कर दी हैं। इसके लिए गूगल , फेसबुक जैसी कई कंपनियों पर यह दवाब बनाया जा रहा है कि वो भारत में अपने सर्वर स्थापित करें । भारत में सोशल मीडिया और इंटरनेट के यूज़र्स की संख्या देखते हुए इसके सकारात्मक परिणाम आने की उम्मीद है । कई जानकारों का कहना है कि डाटा भविष्य का तेल है जिसकी सुरक्षा अभी से ही बेहद जरूरी है ।

भारत में न्यायिक विलंब पर लगातार उठते सवाल और इनके उपाय…

कहतें हैं कि न्याय मिलने में हुआ विलम्ब भी एक तरह का अन्याय ही होता है । अगर इस अन्याय को भारतीय परिपेक्ष्य से देखे तो यह हमेशा ही सवालों के घेरे में रहता है ।

  • भारतीय न्यायालयों में वर्तमान में करीब 4 करोड़ से अधिक मामले लंबित पड़ें हैं।
  • वर्तमान में देश में 10 लाख लोगों पर केवल 18 जज हैं ।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में न्यायिक विलम्ब का मुद्दा हमेशा से ही विवादों में बना रहता है । यह मुद्दा एक बड़े प्रकाश में तब आया जब न्यायिक विलंबों पर लगातार कटाक्षों से आहत हो कर देश के तत्कालीन सीजेआई टी.एस ठाकुर  रो पड़ें थे ।

दुनिया के सबसे मजबूत न्याय तंत्रों में से एक भारतीय न्यायलयों में वर्तमान में करीब 4 करोड़ से अधिक मामले लंबित पड़ें हैं। इनमें सर्वोच्च न्यायालय में 59000 , उच्च न्यायलयों में 44 लाख़ व अधीनस्थ न्यायलयों में करीब 3 करोड़ मुक़दमें लंबित हैं जो काफ़ी चिंताजनक विषय है ।

दिल्ली के निर्भया कांड के आरोपियों को सज़ा मिलने में 7 साल लगने , और हैदराबाद व विकास दूबे एनकाउंटर ने इस मुद्दे पर चर्चा को एक बार फिऱ से हवा दे दी है ।
देश में न्यायिक विलंब के कई नुकसान लगातार देखने को मिलते रहते हैं।  उदाहरण स्वरूप अगर कोई रेप का आरोपी जेल में बंद है, तो वह न्यायिक विलम्ब का फायदा उठा कर जमानत या अन्य तरीकों द्वारा पीड़ित और सबूतों को क्षति पहुंचाने का प्रयास करता है । वहीँ एक दूसरा पक्ष ये भी है की कई बार कोई निर्दोष शख्स किसी केस की वजह से जेल तो जाता है, लेकिन उसकी सुनवाई होने और आरोपमुक्त होते होते वो कई साल जेल में गुज़ार चुका होता है। यह भी एक तरीके का अन्याय ही है ।

न्यायिक विलम्ब के कारण — इसके प्रमुख कारणों में से एक जजों , अदालतों व न्यायिक कर्मचारियों की भारी कमी है । वर्तमान में देश में 10 लाख लोगों पर केवल 18 जज हैं । वहीँ न्यायालय परिसरों में मूलभूत ढांचे की कमी , लंबे अवकाश व संचार और तकनीकों की कमी भी एक समस्या है । भारत में वाद सुलझाने के लिए कोई तय सीमा नहीं है जबकि अमरीका में यह 3 साल तय है । सामान्य व गंभीर मामले का अलग न होना , वकीलों के खर्च , प्रक्रिया की जटिलता आदि भी कुछ समस्याएं हैं ।

उपाय — न्यायिक विलम्ब को कम करने के लिए जजों और लोक व ग्राम अदालतों की संख्या को बढ़ाया जाना चाहिए । वहीँ जजों की कार्यावधि बढ़ानें , जजों व कर्मचारियों की रिक्त सीटें भरने के काम में तेज़ी लाई जानी चाहिए । सामान्य व गंभीर मामलों का बंटवारा करना चाहिए । न्यायलयों को तकनीक से परिपूर्ण व ज्यादा से ज़्यादा फास्टट्रैक कोर्ट की स्थापना की जानी चाहिए । इसके अलावा वकीलों के अपीलीय अधिकारों पर एक हद के बाद अंकुश लगाए जाने की भी ज़रूरत है। जिससे न्याय मिलने में ज्यादा विलम्ब न हो ।

भारतीय न्यायपालिका का अपना एक स्वर्णिम इतिहास रहा है । आज भी देश के किसी इंसान के साथ जब कोई अन्याय होता है तब वो कोर्ट की ओर देखता है। लेकिन वर्तमान में इसकी ओर उठती उंगलियां बुरे संकेत देती हैं । सरकार तथा न्यायालय दोनों का कर्तव्य है कि जल्द से जल्द इन समस्याओं का समाधान करें। जिससे लोगों को कम विलम्ब और अधिक पारदर्शिता के साथ जल्द से जल्द न्याय मिल सकें और उनका विश्वास न्यायलय पर फिर से सुदृढ़ हो ।