Thursday, May 30, 2024

मध्य प्रदेश में कांग्रेस के लिए सत्ता से ज्यादा साख बचाने की है चुनौती

कोरोना महामारी के संकट के कारण मध्य प्रदेश विधानसभा उपचुनावों की तारीख अब तक नहीं आयी है। लेकिन राज्य की दोनों पार्टियों भाजपा व कांग्रेस ने इस उपचुनाव के लिए अपनी-अपनी कमर कसनी शुरू कर दी है

  • प्रदेश विधानसभा में रिक्त सीटों की कुल संख्या 27  है ।
  • सिंधिया अपने समर्थक गुट के 6 मंत्रियों समेत 22 विधायकों के साथ कांग्रेस पार्टी को छोड़कर भाजपा में शामिल हो गएं थे ।

दोनों पार्टियों ने अपने स्तर पर चुनाव प्रचार में धार देना भी शुरू कर दिया है। भाजपा ने प्रदेश में चुनावी रैलियां शुरू कर दी हैं। भाजपा ने  उपचुनाव की सभी 27 सीटों के लिए अपने प्रभारी भी नियुक्त कर दिएं हैं। वहीं अगर बात कांग्रेस पार्टी की करें तो कांग्रेस भी जम कर चुनावी सभाएं कर रही हैं। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ इन उपचुनावों के प्रचार का नेतृत्व खुद कर रहें हैं।

230 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत पाने तथा सत्ता में रहने के लिए यह चुनाव भाजपा तथा कांग्रेस दोनों पार्टियों के लिए करो या मरो की स्थिति जैसा है । इस उपचुनाव के ज़रिए जहां पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ अपनी राजनितिक साख बचाने व सत्ता में वापसी की कोशिश में लगें हैं। तो वहीं भाजपा को भी राज्य में अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए इन उपचुनावों में निश्चित ही जीत दर्ज करनी पड़ेगी ।

घटनाक्रम-

प्रदेश में इस राजनीतिक अस्थिरता का अंदाज़ा 2018 में हुए विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद से ही लगातार लगाया जा रहा था । इस चुनाव में कोई भी पार्टी पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं कर पायी थी । विधानसभा की कुल 230 सीटों में से कांग्रेस को 114 , भाजपा को 109 , बसपा को 2 , सपा को 1 व अन्य निर्दलीय उम्मीदवारों को 4 सीटें प्राप्त हुई थी।

कांग्रेस पार्टी ने प्रदेश में कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ के नेतृत्व में निर्दलीय, बसपा व सपा से गठबंधन कर के 15 महीने तक सरकार चलाई। लेकिन राज्य व पार्टी के बड़े चेहरे ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने समर्थक गुट के 6 मंत्रियों समेत 22 विधायकों के साथ कांग्रेस पार्टी को छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए । वें एक अरसे से कांग्रेस पार्टी के भीतर लगातार उपेक्षा का शिकार हो रहे थें।

सिंधिया ने 2018 विधानसभा चुनावों की जीत में बड़ी भूमिका निभाई थी।  इसके बावजूद भी उचित सम्मान न मिलने के बाद राज्य में होने वालें राज्यसभा के निर्वाचन में भी कांग्रेस पार्टी द्वारा उन्हें अँधेरे में रखने की कोशिशें तेज़ हो रहीं थी। इसके बाद सिंधिया ने यह बड़ा कदम उठाते हुए कांग्रेस पार्टी का त्याग कर दिया । कांग्रेस पार्टी अपनी पूरी कोशिशों के बावजूद भी सिंधिया व बागी विधायकों को वापस लाने में नाकाम रही ।

इस घटनाक्रम के बाद विधानसभा में संख्याबल की कमी की वजह से कांग्रेस पार्टी अल्पपमत में चली गई । भाजपा ने भी लगातार फ्लोर टेस्ट की मांग तेज़ की। भाजपा ने विधानसभा अध्यक्ष एन.पी. प्रजापति पर जानबूझ कर विधायकों का इस्तीफा न स्वीकार करने और विश्वास मत प्रस्ताव में देरी करने का आरोप लगाया। इस देरी को भांपते हुए भाजपा ने विधानसभा में फ्लोर टेस्ट की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष याचिका दायर की। इसपर फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा में बहुमत परिक्षण का आदेश दिया ।

बहुमत परीक्षण से पूर्व ही मुख्यमंत्री कमलनाथ ने 20 मार्च को प्रदेश के राज्यपाल लाल जी टंडन को अपना इस्तीफा सौंप दिया। जबकि वें 24 घंटे पहले तक सरकार पर किसी तरह के संकट से साफ़ इंकार कर रहें थें।

सिंधिया समर्थक 22 विधायको द्वारा इस्तीफे के बाद प्रदेश विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 206 सीटों का रह गया था । बीजेपी ने 107 सीटों के साथ सरकार बनाई व निर्दलीयों ने भी आंतरिक स्तर पर पार्टी का साथ दिया । इसके बाद 23 मार्च को शिवराज सिंह चौहान ने चौथी बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली ।

ज़रूरत – भविष्य में प्रदेश में किस पार्टी की सरकार होगी इसके लिए सभी दलों व जनता की नज़रें 27 सीटों पर होने वाले उपचुनाव पर आ टिकी हैं। 22 विधायकों के इस्तीफे के बाद कांग्रेस पार्टी के 3 और विधायकों ने अब तक अपना इस्तीफा विधानसभा अध्यक्ष को सौंप दिया है । इसके अलावा जौर व आगर सीटों के विधायकों के निधन के बाद से प्रदेश विधानसभा में रिक्त सीटों की कुल संख्या 27 हो गई हैं । इस उपचुनाव में भाजपा को सत्ता में बने रहने के लिए मात्र 9 सीटों पर जीत की ज़रूरत है । जबकि कांग्रेस पार्टी को वापस से सरकार बनाने हेतु सभी 27 सीटों पर जीत दर्ज करनी होगी जो की एक नामुमकिन सी बात मानी जा रही है ।

वर्तमान परिस्थिति – वर्तमान हालातों पर नज़र डालें तो उपचुनाव में कांग्रेस पार्टी की जीत बहुत ज़्यादा कठिन नज़र आती दिख रही है। गौरतलब है कि इन उपचुनावों की 27 में से लगभग 16 सीटें ग्वालियर तथा चंबल संभाग के क्षेत्र की है । यहां हमेशा से ही ज्योतिरादित्य सिंधिया का खासा प्रभुत्व माना जाता रहा है। वर्तमान में सिंधिया भी भाजपा की ओर से राज्यसभा में निर्वाचित हो चुके हैं । ऐसा माना जा रहा है कि कोरोना संकट और प्रदेश उपचुनाव के बाद उन्हें केंद्र में बड़ी जिम्मेदारी भी मिल सकती है ।

ऐसे में कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी का इन सीटों पर जीतना टेढ़ी खीर के समान माना जा रहा है। कांग्रेस भी इन तमाम चुनौतियों से निबटने के लिए लगातार कोशिशें करते दिखाई पड़ रही है । हाल ही में कांग्रेस पार्टी ने ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया के करीबी माने जाने वाले बालेंदु शुक्ला की पार्टी में वापसी करवाई है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो इस कदम से उपचुनावों के समीकरणों पर कोई ज्यादा खास असर पड़ता नही दिखने वाला है । उनका मानना है कि प्रदेश में उपचुनावों में सत्ता में बैठी पार्टी के उम्मीदवार के जितने की रीत रही है ।

वहीं कोरोना संकट के दौर में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा जनता के लिए अनेक राहत के कार्य व संबल जैसी कई कल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत भी भाजपा को बड़ा फायदा पहुंचाती दिख रही है। जिससे प्रदेश में भाजपा कार्यकर्ताओं में उत्साह तो वहीँ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में बड़े स्तर पर मनोबल की कमी साफ़ नज़र आ रही है। लेकिन कांग्रेस के नेताओं तथा प्रवक्ताओं ने इन बातों को सिरे से ख़ारिज किया है। उन्होनें विश्वास जताया है कि पार्टी 27 मेंं से लगभग 25 सीटें जीतेेगी और सत्ता में वापसी करेगी । क्योंकि पूर्व मुर्ख्यमंत्री कमलनाथ स्वयं ही अपने स्तर पर इस चुनाव की पूरी कमान संभाल रहें हैं ।

वहीं अगर सत्ता मे विराजमान भाजपा की बात करें तो यहां भी पार्टी में कई नेताओं की नाराज़गी की बातें बाहर आ रही हैं। मंत्रिमंडल विस्तार में खास जगह तथा उपचुनाव में भी सिंधिया गुट के ही विधायकों को फिर से टिकट मिला है। इस के कारण भाजपा के कुछ अपने लोग कई बार नाराज़गी ज़ाहिर करते देखें जा रहे हैं। इस बात का फ़ायदा निश्चित ही कांग्रेस पार्टी उपचुनाव में उठाने की कोशिश करेगी । हालांकि इस बात को सिरे से नकारते हुए भाजपा के नेताओं का कहना है कि “भाजपा एक पार्टी नहीं बल्कि परिवार है। यहां सभी आपस में मिल जुलकर बातें करते हैं। कहीं कोई मतभेद की स्थिति नहीं रहती। पार्टी अपने नेताओं के दम पर उपचुनाव की सभी सीटें जीतकर दिखाएगी।

लगातार कोशिशों और जीत के अपने – अपने दावों के बीच यह तो आने वाले उपचुनावों के परिणाम ही बताएंगे कि मध्यप्रदेश में सत्ता भाजपा के हाथों में ही रहती है या कांग्रेस पार्टी के पास वापस चली जाती हैं । लेकिन फ़िलहाल इतना ज़रूर कहा जा सकता है की भाजपा के लिए जीत की राह काफ़ी आसान है। तो कांग्रेस के लिए एक नामुमकिन सा सफ़र । वहीँ प्रदेश में यह उपचुनाव कांग्रेस तथा पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के लिए सत्ता बचाने या वापसी करने से ज़्यादा अपनी साख़ बचाने की बन चुकी है।

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