चुनावी गर्मी:- कहतें है ना यूपी की राजनीति कब कौनसा मोड़ लेले कुछ कहा नहीं जा सकता यूपी विधानसभा चुनाव के पांचवे चरण का मतदान होने जा रहा है। लेकिन सियासी गर्मी अब ‘गधे’ पर अटक गयी है। गधों पर हो रही सियासत में अब आम आदमी पार्टी नेता और कवि डॉ. कुमार विश्वास भी कूद पड़े हैं.
दरअसल कुमार विस्वास ने अपने ट्विटर हैंडल से एक 2 मिनट 31 सेकंड का वीडियो अपलोड कि है जिसमे उन्होंने ‘गधों’ हो रही बयानबाजी पर चुटकी ली।
वीडियो में वे कह रहे हैं, “ये फाल्गुन का महीना है और लोकतंत्र का महापर्व चुनाव् चल रहा है लेकिन वैशाख नंदन गधा इस समय अनायास ही प्रसंग में है, चर्चा में है. मुझे हिंदी कवि सम्मेलनों के आचार्य हास्य कवि स्व. ओम प्रकाश ‘आदित्य’ की एक लोकप्रिय कविता याद आ गई.”
विश्वास आगे कह रहे हैं, ‘उन्होंने सैकड़ों बार हम सब के सामने इसका वाचन किया. और हमने बड़े आनंद के साथ इस कविता का पाठ सुना. लेकिन कविता आज इतनी प्रासंगिक होगी बड़ा आश्चर्य है. आपकी सेवा में प्रस्तुत करता हूं…
- आपको ध्यान दिला दें यूपी सीएम अखिलेश यादव ने पिछले दिनों अपनी एक चुनावी रैली में अप्रत्यक्ष तौर पर मोदी और शाह पर निशाना साधते हुए कहा था कि वह सदी के महानायक ‘अमिताभ बच्चन से आग्रह करेंगे कि वह गुजराती गधों का प्रचार न करें.’ जिसके बाद पीएम मोदी ने यूपी के बहराइच में रैली को संबोधित करते हुए कहा, ‘अखिलेश को गुजरात के गधों से इतनी नफरत क्यों है. गधे भी अपने मालिक के प्रति वफादार होते हैं.’
वहीँ अब कवी कुमार विश्वास ने ये कविता पढ़ चुटकी ली…
इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं
जिधर देखता हूं, गधे ही गधे हैं.
गधे हंस रहे, आदमी रो रहा हैहिन्दोस्तां में ये क्या हो रहा है.
जवानी का आलम गधों के लिये हैये रसिया, ये बालम गधों के लिये है.
ये दिल्ली, ये पालम गधों के लिये हैये संसार सालम गधों के लिये है.
पिलाए जा साकी, पिलाए जा डट केतू विहस्की के मटके पै मटके पै मटके
मैं दुनियां को अब भूलना चाहता हूंगधों की तरह झूमना चाहता हूं.
घोडों को मिलती नहीं घास देखोगधे खा रहे हैं च्यवनप्राश देखो
यहां आदमी की कहां कब बनी हैये दुनियां गधों के लिये ही बनी है.
जो गलियों में डोले वो कच्चा गधा हैजो कोठे पे बोले वो सच्चा गधा है.
जो खेतों में दीखे वो फसली गधा हैजो माइक पे चीखे वो असली गधा है.
मैं क्या बक गया हूं, ये क्या कह गया हूंनशे की पिनक में कहां बह गया हूं.
मुझे माफ करना मैं भटका हुआ थावो ठर्रा था, भीतर जो अटका हुआ था.
इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैंजिधर देखता हूं, गधे ही गधे हैं.
