जानिए क्या है RTI संशोधन एक्ट ?

किसी भी देश में नागरिकों को मिलने वाले अधिकार व सुविधाओं में पारदर्शिता एक महत्वपूर्ण घटक माना जाता है। यह  उस लोकतंत्र तथा जनता को और ज्यादा मजबूत और जागरूक बनाता है । भारत का संविधान भी यही कहता है कि देश में लोकतंत्र और संविधान की असल शक्ति जनता में ही निहित है ।

RTI का इतिहास

इन्ही बातों को ध्यान में रखते हुए साल 2005 में भारत सरकार ने देश की जनता को RTI यानी सूचना के अधिकार का कानून प्रदान किया था। ताकि इसकी मदद से अफ़सरशाही , प्रशासन तथा उनके कामकाज को पारदर्शी और उन तक जनता की पहुंच को भी सुलभ बनाया जा सकें।

इस कानून के अनुसार देश का कोई भी नागरिक देश के मंत्रालयों विभागों आदि से सूचना प्राप्त करने का अधिकार रखता हैं। इस कानून के अंतर्गत देश के 2200 विभागों को रखा गया है। इनमे राज्य , केंद्र , पीएमओ , सीएजी , सहित सीजेआई का ऑफिस भी शामिल है।

इस कानून के तहत भारत का नागरिक देश के किसी भी विभाग से सुचना प्राप्त करने का अधिकार रखता है। जिसे उस विभाग को 30 दिनों के भीतर देना पड़ेगा। वहीं जीने के अधिकार के मामले में 48 घंटे के अंदर जानकारी देनी पड़ेगी।

इसके अंतर्गत 1 मुख्य सूचना आयुक्त व 10 सूचना आयुक्त होते हैं । ठीक यही संख्या राज्यों के मामले में भी होती है ।

घटना

हाल ही में संसद द्वारा RTI संशोधन अधि. 2020 पास किया गया। इसे लेकर विपक्ष की पार्टियों ने अपना विरोध जाहिर किया है। इस संशोधन के अनुसार अब राज्य व केंद्र दोनों के सूचना आयुक्तों की नियुक्तियां उनके वेतन व सेवा शर्ते केंद्र सरकार द्वारा तय की जाएंगी। केंद्र की इस कमिटी में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व कैबिनेट मंत्री शामिल होंगे। जबकि इस संशोधन से पहले सुचना आयुक्तों की नियुक्ति व सेवा शर्तें चुनाव आयोग के आयुक्तों के तर्ज पर की जाती थी ।

पक्ष – विपक्ष

विरोधी दलों का कहना है कि सरकार सूचना के कानून को कमजोर कर रही है, जिसके बुरे परिणाम सामने आएंगे। वहीं इसके बचाव में सरकार का कहना है कि इस कानून को तब काफी हड़बड़ी में लाया गया था जिसमें कई सुधार जरूरी थे। यह एक कानून/अधि. है, जबकि चुनाव आयोग एक संवैधानिक निकाय है।

इसलिए दोनों की शर्तों व कार्यान्वयन आदि में स्पष्टता ज़रूरी थी। सरकार ने कहा कि वह RTI कानून को और ज्यादा संस्थागत , व्यवस्थित , और परिणामोन्मुखी बनाने का प्रयास कर रही है। RTI को कमजोर करने के आरोप पर सरकार ने कहा कि वह RTI के धारा 27 में परिवर्तन कर रही है, जबकि इसकी स्वायत्तता व स्वतंत्रता धारा 12(3) में है।

जरूरी कदम और भविष्य

सरकार ने भले ही विपक्ष के आरोपों का जवाब दे दिया हो व RTI को परिणामोन्मुखी बनाने पर जोर दिया हो। लेकिन अब भी इसकी राह में RTI कार्यकर्ताओं की हत्या , व्हिसल्ब्लोवर कानून का सही से पालन न होना , विभागों में कर्मचारियों की कमी जैसी कई समस्याएं है। वहीं 1923 का Official secret act भी इसे कमजोर बनाता है।

ध्यान देने वाली बात है कि RTI को दुनिया के कुछ सबसे बेहतर कानूनों में से एक की संज्ञा दी जाती है। इसपर सरकार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण भविष्य में नकारात्मक प्रभाव भी डाल सकता है । कुछ वर्ष पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने CBI को पिंजरे में बंद तोते की संज्ञा दी थी जो इसका एक उदाहरण है । इसलिए सरकार को ऐसे प्रावधान करने चाहिए जिससे RTI की स्वायत्तता अक्षुण्ण बनी रहे ।

मध्य प्रदेश में कांग्रेस के लिए सत्ता से ज्यादा साख बचाने की है चुनौती

कोरोना महामारी के संकट के कारण मध्य प्रदेश विधानसभा उपचुनावों की तारीख अब तक नहीं आयी है। लेकिन राज्य की दोनों पार्टियों भाजपा व कांग्रेस ने इस उपचुनाव के लिए अपनी-अपनी कमर कसनी शुरू कर दी है

  • प्रदेश विधानसभा में रिक्त सीटों की कुल संख्या 27  है ।
  • सिंधिया अपने समर्थक गुट के 6 मंत्रियों समेत 22 विधायकों के साथ कांग्रेस पार्टी को छोड़कर भाजपा में शामिल हो गएं थे ।

दोनों पार्टियों ने अपने स्तर पर चुनाव प्रचार में धार देना भी शुरू कर दिया है। भाजपा ने प्रदेश में चुनावी रैलियां शुरू कर दी हैं। भाजपा ने  उपचुनाव की सभी 27 सीटों के लिए अपने प्रभारी भी नियुक्त कर दिएं हैं। वहीं अगर बात कांग्रेस पार्टी की करें तो कांग्रेस भी जम कर चुनावी सभाएं कर रही हैं। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ इन उपचुनावों के प्रचार का नेतृत्व खुद कर रहें हैं।

230 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत पाने तथा सत्ता में रहने के लिए यह चुनाव भाजपा तथा कांग्रेस दोनों पार्टियों के लिए करो या मरो की स्थिति जैसा है । इस उपचुनाव के ज़रिए जहां पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ अपनी राजनितिक साख बचाने व सत्ता में वापसी की कोशिश में लगें हैं। तो वहीं भाजपा को भी राज्य में अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए इन उपचुनावों में निश्चित ही जीत दर्ज करनी पड़ेगी ।

घटनाक्रम-

प्रदेश में इस राजनीतिक अस्थिरता का अंदाज़ा 2018 में हुए विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद से ही लगातार लगाया जा रहा था । इस चुनाव में कोई भी पार्टी पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं कर पायी थी । विधानसभा की कुल 230 सीटों में से कांग्रेस को 114 , भाजपा को 109 , बसपा को 2 , सपा को 1 व अन्य निर्दलीय उम्मीदवारों को 4 सीटें प्राप्त हुई थी।

कांग्रेस पार्टी ने प्रदेश में कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ के नेतृत्व में निर्दलीय, बसपा व सपा से गठबंधन कर के 15 महीने तक सरकार चलाई। लेकिन राज्य व पार्टी के बड़े चेहरे ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने समर्थक गुट के 6 मंत्रियों समेत 22 विधायकों के साथ कांग्रेस पार्टी को छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए । वें एक अरसे से कांग्रेस पार्टी के भीतर लगातार उपेक्षा का शिकार हो रहे थें।

सिंधिया ने 2018 विधानसभा चुनावों की जीत में बड़ी भूमिका निभाई थी।  इसके बावजूद भी उचित सम्मान न मिलने के बाद राज्य में होने वालें राज्यसभा के निर्वाचन में भी कांग्रेस पार्टी द्वारा उन्हें अँधेरे में रखने की कोशिशें तेज़ हो रहीं थी। इसके बाद सिंधिया ने यह बड़ा कदम उठाते हुए कांग्रेस पार्टी का त्याग कर दिया । कांग्रेस पार्टी अपनी पूरी कोशिशों के बावजूद भी सिंधिया व बागी विधायकों को वापस लाने में नाकाम रही ।

इस घटनाक्रम के बाद विधानसभा में संख्याबल की कमी की वजह से कांग्रेस पार्टी अल्पपमत में चली गई । भाजपा ने भी लगातार फ्लोर टेस्ट की मांग तेज़ की। भाजपा ने विधानसभा अध्यक्ष एन.पी. प्रजापति पर जानबूझ कर विधायकों का इस्तीफा न स्वीकार करने और विश्वास मत प्रस्ताव में देरी करने का आरोप लगाया। इस देरी को भांपते हुए भाजपा ने विधानसभा में फ्लोर टेस्ट की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष याचिका दायर की। इसपर फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा में बहुमत परिक्षण का आदेश दिया ।

बहुमत परीक्षण से पूर्व ही मुख्यमंत्री कमलनाथ ने 20 मार्च को प्रदेश के राज्यपाल लाल जी टंडन को अपना इस्तीफा सौंप दिया। जबकि वें 24 घंटे पहले तक सरकार पर किसी तरह के संकट से साफ़ इंकार कर रहें थें।

सिंधिया समर्थक 22 विधायको द्वारा इस्तीफे के बाद प्रदेश विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 206 सीटों का रह गया था । बीजेपी ने 107 सीटों के साथ सरकार बनाई व निर्दलीयों ने भी आंतरिक स्तर पर पार्टी का साथ दिया । इसके बाद 23 मार्च को शिवराज सिंह चौहान ने चौथी बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली ।

ज़रूरत – भविष्य में प्रदेश में किस पार्टी की सरकार होगी इसके लिए सभी दलों व जनता की नज़रें 27 सीटों पर होने वाले उपचुनाव पर आ टिकी हैं। 22 विधायकों के इस्तीफे के बाद कांग्रेस पार्टी के 3 और विधायकों ने अब तक अपना इस्तीफा विधानसभा अध्यक्ष को सौंप दिया है । इसके अलावा जौर व आगर सीटों के विधायकों के निधन के बाद से प्रदेश विधानसभा में रिक्त सीटों की कुल संख्या 27 हो गई हैं । इस उपचुनाव में भाजपा को सत्ता में बने रहने के लिए मात्र 9 सीटों पर जीत की ज़रूरत है । जबकि कांग्रेस पार्टी को वापस से सरकार बनाने हेतु सभी 27 सीटों पर जीत दर्ज करनी होगी जो की एक नामुमकिन सी बात मानी जा रही है ।

वर्तमान परिस्थिति – वर्तमान हालातों पर नज़र डालें तो उपचुनाव में कांग्रेस पार्टी की जीत बहुत ज़्यादा कठिन नज़र आती दिख रही है। गौरतलब है कि इन उपचुनावों की 27 में से लगभग 16 सीटें ग्वालियर तथा चंबल संभाग के क्षेत्र की है । यहां हमेशा से ही ज्योतिरादित्य सिंधिया का खासा प्रभुत्व माना जाता रहा है। वर्तमान में सिंधिया भी भाजपा की ओर से राज्यसभा में निर्वाचित हो चुके हैं । ऐसा माना जा रहा है कि कोरोना संकट और प्रदेश उपचुनाव के बाद उन्हें केंद्र में बड़ी जिम्मेदारी भी मिल सकती है ।

ऐसे में कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी का इन सीटों पर जीतना टेढ़ी खीर के समान माना जा रहा है। कांग्रेस भी इन तमाम चुनौतियों से निबटने के लिए लगातार कोशिशें करते दिखाई पड़ रही है । हाल ही में कांग्रेस पार्टी ने ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया के करीबी माने जाने वाले बालेंदु शुक्ला की पार्टी में वापसी करवाई है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो इस कदम से उपचुनावों के समीकरणों पर कोई ज्यादा खास असर पड़ता नही दिखने वाला है । उनका मानना है कि प्रदेश में उपचुनावों में सत्ता में बैठी पार्टी के उम्मीदवार के जितने की रीत रही है ।

वहीं कोरोना संकट के दौर में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा जनता के लिए अनेक राहत के कार्य व संबल जैसी कई कल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत भी भाजपा को बड़ा फायदा पहुंचाती दिख रही है। जिससे प्रदेश में भाजपा कार्यकर्ताओं में उत्साह तो वहीँ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में बड़े स्तर पर मनोबल की कमी साफ़ नज़र आ रही है। लेकिन कांग्रेस के नेताओं तथा प्रवक्ताओं ने इन बातों को सिरे से ख़ारिज किया है। उन्होनें विश्वास जताया है कि पार्टी 27 मेंं से लगभग 25 सीटें जीतेेगी और सत्ता में वापसी करेगी । क्योंकि पूर्व मुर्ख्यमंत्री कमलनाथ स्वयं ही अपने स्तर पर इस चुनाव की पूरी कमान संभाल रहें हैं ।

वहीं अगर सत्ता मे विराजमान भाजपा की बात करें तो यहां भी पार्टी में कई नेताओं की नाराज़गी की बातें बाहर आ रही हैं। मंत्रिमंडल विस्तार में खास जगह तथा उपचुनाव में भी सिंधिया गुट के ही विधायकों को फिर से टिकट मिला है। इस के कारण भाजपा के कुछ अपने लोग कई बार नाराज़गी ज़ाहिर करते देखें जा रहे हैं। इस बात का फ़ायदा निश्चित ही कांग्रेस पार्टी उपचुनाव में उठाने की कोशिश करेगी । हालांकि इस बात को सिरे से नकारते हुए भाजपा के नेताओं का कहना है कि “भाजपा एक पार्टी नहीं बल्कि परिवार है। यहां सभी आपस में मिल जुलकर बातें करते हैं। कहीं कोई मतभेद की स्थिति नहीं रहती। पार्टी अपने नेताओं के दम पर उपचुनाव की सभी सीटें जीतकर दिखाएगी।

लगातार कोशिशों और जीत के अपने – अपने दावों के बीच यह तो आने वाले उपचुनावों के परिणाम ही बताएंगे कि मध्यप्रदेश में सत्ता भाजपा के हाथों में ही रहती है या कांग्रेस पार्टी के पास वापस चली जाती हैं । लेकिन फ़िलहाल इतना ज़रूर कहा जा सकता है की भाजपा के लिए जीत की राह काफ़ी आसान है। तो कांग्रेस के लिए एक नामुमकिन सा सफ़र । वहीँ प्रदेश में यह उपचुनाव कांग्रेस तथा पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के लिए सत्ता बचाने या वापसी करने से ज़्यादा अपनी साख़ बचाने की बन चुकी है।

क्या होंगे राज्यों द्वारा श्रम कानूनों में बदलाव का असर ?

कोरोना संकट में चीन से पलायन करती कंपनियों तथा निवेशों को भारत में लाने के उद्देश्य से राज्यों ने अपने श्रम कानूनों में बड़े बदलाव किएं हैं । अमरीका – चीन के बीच छिड़े ट्रेड वॉर के वक्त भी कई कंपनियों ने चीन से पलायन किया था। लेकिन जटिल श्रम कानून व कुशल श्रमिकों की कमी के कारण उन्होंने अन्य देशों का रुख़ किया था ।

  • मध्य प्रदेश ने 1000 , गुजरात ने 1200 दिनों के लिए श्रम कानूनों में बदलाव किएं हैं ।
  • कंपनियां मजदूरों से 8 के बजाए 12 घण्टे व हफ़्ते में 72 घंटों तक का ओवरटाइम ले सकती हैं ।

देश मे एक के बाद एक कई राज्यों ने श्रम कानूनों मे बदलाव किएं हैं ।  हालिया बदलावों की बात करें तो उत्तर प्रदेश सरकार ने बंधुआ मजदूरी , वेतन संदाय व महिला नियोजन छोड़कर अन्य सभी कानूनों को 3 वर्षों के लिए निलंबित कर दिया है । मध्य प्रदेश ने 1000 , गुजरात ने 1200 दिनों व हरियाणा , राजस्थान , महाराष्ट्र , पंजाब आदि ने भी श्रम कानूनों में बदलाव किएं हैं ।

इन बदलावों के बाद अब कंपनियां मजदूरों से 8 के बजाय 12 घण्टे व हफ़्ते में 72 घंटों तक का ओवरटाइम ले सकती हैं । इसके अलावा श्रमिकों पर हुई कार्रवाई के मामले में श्रम न्यायलयों का भी हस्तक्षेप अब लगभग खत्म हो जाएगा । इसके परिणाम स्वरूप अब कॉन्ट्रैक्ट पर नौकरी , कभी भी निकाले जाना , पीएफ बोनस आदि पर भी नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकतें हैं ।

इन बदलावों का कई श्रमिक संगठनों , विपक्षी दलों और समाजसेवियों ने कड़ा विरोध किया है।  उनका आरोप है कि कानून में बदलाव से मजदूरों का शोषण बढ़ेगा और 8 की जगह 12 घण्टे काम से बेरोजगारी भी बढ़ेगी । वहीँ इस पर सरकार का तर्क है कि निवेश और अर्थव्यवस्था को गति देने हेतु यह बदलाव आवश्यक हैं । इसके माध्यम से मजदूरोँ को उनके गृह राज्यों में काम मिलने में आसानी होगी। वहीँ राज्यों के राजस्व में भी वृद्धि होगी और मजदूरों का हक़ सुनिश्चित होगा ।।

कोरोना संकट के कारण अर्थव्यवस्था व निवेश को गति देने जितना आवश्यक है। लेकिन उतना ही आवश्यक पहले से कोरोना संकट की मार झेल रहे मजदूरों की आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है । गौरतलब है कि दुनिया में श्रम कानूनों को लाने का मुख्य कारण मजदूरों को शोषण से मुक्ति दिलाना था । इसलिए सरकार का कर्तव्य है कि श्रमिकों के अधिकारोँ की रक्षा करें और कानूनों के निलंबन के अलावा भी अन्य उपायों की तलाश की जाएं ।

अमरीका में समानता की लड़ाई

अमरीका में पुलिस हिरासत मे हुई जाॅर्ज फ्लाॅयड की मौत के बाद बड़े स्तर पर प्रदर्शन चालू हैं।  यह प्रदर्शन कहीं – कहीं पर हिंसक भी हो गएं हैं ।

  • हिंसा के डर से राष्ट्रपति ट्रम्प को बंकर मे जाना पड़ा ।
  • वर्तमान मे कोविड 19 से हुई मौतों में भी अश्वेतों का आंकडा़ भारी है ।

1861 से 1864 तक चले अमरीकी सिवील वाॅर के खत्म होने के बाद अमरीका से दास प्रथा का अंत हुआ था। यह कदम वहां सदियों से दासता प्रताड़ना व नर्क यातना झेल रहे अश्वेतों के लिए किसी सपने के सच होने जैसा था । लेकिन इसके बाद भी अमरीकी समाज मे  नस्लीय भेदभाव समय समय पर व्य़ापक स्तर पर दिखाई पड़ता रहा । लगभग 100 साल बाद मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने 1960 मे महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित हो कर नागरिक अधिकार आंदोलन का नेतृत्व किया। इसे अमरीकी इतिहास का सबसे बडा आंदोलन माना गया । इसके परिणाम स्वरूप अमरीका मे नागरिक अधिकार कानून पारित हुआ जिसके बाद अमरीकी समाज मे नस्लवाद की समस्या मे एक बड़ा बदलाव आया ।

घटना – समय – समय पर ऐसे कई मामले सामने आते रहते हैं जिससे यह साबित होता है कि अब भी नस्लवाद की समस्या अमरीकी समाज मे व्याप्त है । इसका सबसे नया उदाहरण अमरीका के मीनीयापोलिस शहर से शुरु हुआ ब्लैक लाईव मैटर आंदोलन है । नकली डाॅलर बेचने के आरोप मे पकड़े गए जार्ज फ्लाईड की मौत पुलिस हिरासत में घुटने से गला दबाने से हो गई। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया जिसके बाद अमरीका के कई बडे शहरों मे आंदोलनो व  हिंसा की  शुरुआत हुई  । व्हाईट हाऊस के पास भीड़ जमा होने व हिंसा के डर से राष्ट्रपति ट्रम्प को बंकर में जाना पड़ा । आंदोलनकारी अमरीका मे पुलिस सुधार , नस्लवाद का विरोध व अश्वेतों को हक देने की मांग कर रहें हैं ।

कारण – जानकार बतातें हैं की इस आंदोलन के पीछे लोगों के भीतर लम्बे समय से व्याप्त असंतोष मुख्य कारण है । आपराधिक मामलों मे अश्वेतों की संख्या बहुत ज्यादा है तो वहीं रोजगार में बहुत कम । पुलिस द्वारा मारे गएं लोगों में भी अश्वेतों का प्रतिशत काफी ज्यादा रहता है । इसके अलावा हाॅलिवुड व अन्य संस्थानों मे भी नस्लवाद अब भी बाकी है । वर्तमान मे कोविड 19 से हुई मौतों में भी इनका आंकडा़ भारी है ।

राष्ट्रपति ट्रम्प पर भी शुरुआत से ही नस्लभेद के आरोप लगतें रहें है । आंदोलन के दौरान भी अपनी बयानबाजी के लिए उन्हें कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी है । इसका असर शायद आगामी अमरीकी चुनाव में देखने को मिल सकता है । उन्होने आंदोलनकारियों को ठग बताया तथा लोगों से कानून का पालन करने की अपील की है।  साथ ही एंतीफा नाम के संगठन पर प्रतिबंध का भी ऐलान किया है ।

बहरहाल अब यह आंदोलन अमरीका से बाहर कई देशों मे फैल गया है और उम्मीद जताई जा रही है की इसके परिणाम व्यापक होंगे और कई बदलाव लेकर आएँगे ।

 

 

क्या है नक्सलवाद की समस्या की जड़ और इसके निराकरण के उपाय ??

देश की आज़ादी के करीब 1.5 दशक बाद 1969 से शुरू हुई नक्सलवाद की समस्या आज भी देश की सबसे प्रमुख आंतरिक समस्या के रूप में मौजूद है । 2008 में तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह ने भी इसे देश के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बताया था ।

  • 2009 से 2013 के बीच देश भर में 8782 तो वहीँ 2014 से 2018 तक 4969 नक्सल घटनाएं देखने को मिली थी ।
  • 2017 में सरकार ने इस समस्या से निबटने को SAMADHAN नीति का प्रारंभ किया ।

समय – समय पर गाहे बगाहे नक्सली देश के किसी न किसी कोने में घटनाओं को अंजाम देते रहते हैं। कोरोना संकट के समय में भी इनकी ओर से कई छोटी घटनाएं देखने को मिलती रहीं हैं । कई बार हमारे जवान इनकी साजिशों को नाकाम कर देते हैं तो वहीँ कई बार नक्सली बड़ी वारदातें करने में कामयाब हो जातें हैं । कुछ ही समय पहले छत्तीसगढ़ ,महाराष्ट्र आदि राज्यो में हुई नक्सलवादी घटनाएं इसका उदाहरण हैं ।
आंकड़ो की बात करें तो  2009 से 2013 के बीच देश भर में 8782 तो वहीँ 2014 से 2018 तक 4969 नक्सल घटनाएं देखने को मिली थी ।

इतिहास – नक्सलवाद का जन्म दार्जलिंग के नक्सलबाड़ी नाम के एक गांव से हुआ था । जमींदारों द्वारा उत्पीड़न के विरोध में सत्ता के ख़िलाफ़ खड़ा हुआ यह आंदोलन माओ की नीति से प्रेरित था। इसलिए इन्हें माओवादी भी कहा जाता है । इसका नेतृत्व मुख्य रूप से चारु मजूमदार , कानू सान्याल , व कन्हाई चटर्जी द्वारा किया गया था ।

वर्तमान स्थिति – देश के कई राज्य जैसे झारखण्ड , छत्तीसगढ़ , पश्चिम बंगाल , महाराष्ट्र , उड़ीसा आदि नक्सलवाद की समस्या से पीड़ित हैं । लेकिन वर्तमान समय में अर्बन (शहरी) नक्सलवाद की समस्या का मुद्दा भी बार बार चर्चा में आता रहता है। इसका उदाहरण भीमा कोरेगांव के मामले के बाद हुईं गिरफ्तारियां हैं । अर्बन नक्सलवाद की नीति CPIM द्वारा 2004 में जारी हुए “अर्बन पर्सपेक्टिव” से प्रेरित बताई जाती है। इसका उद्देश्य बड़े शहरों , विश्वविद्यालयों तक नक्सवाद की पहुंच बनाना हैं ।

नक्सलवाद के कारण – इसका प्रमुख कारण देश के आदिवासी व पिछड़े क्षेत्रों तक विकास कार्यों का न पहुंचना। उत्पीड़न , नौकरी व साक्षरता की कमी , खनिजों के उत्खनन में उनकी घरों आदि को छीनना और पुलिस द्वारा बड़े पैमाने पर दमन को बताया जाता है ।
लेकिन वर्तमान स्थिति की बात करें तो यह आंदोलन अपने मार्ग से भटक कर उत्पीड़न आदि के विरोध के बजाय विकास कार्यों के बाधक के रूप में दिखाई पड़ने लगा है । विकास कार्यो में बाधा पहुँचाना , लेवी की वसूली , जवानों व विरोधी लोगों की हत्याएं करना इस बात का उदाहरण हैं ।

सरकार के कदम – कई प्रभावी नीतियों की वजह से आज नक्सलवाद की समस्या में काफ़ी सुधार भी देखने को मिला है । 2017 में सरकार ने इस समस्या से निबटने को SAMADHAN नीति का प्रारंभ किया। इसका मुख्य उद्देश्य कुशल व आक्रामक नीति द्वारा ख़ुफ़िया तंत्र को मजबूत बनाना , नक्सलियों के वित्त पोषण को ख़त्म करना आदि है । इसके अलावा पिछड़े इलाकों तक विकास कार्य – योजनाओं को पहुँचाना ,संचार , स्कूल , अस्पताल , बैंक व सड़कों की स्थिति सही करना आदि कार्य किएं गएं हैं । वहीं आत्मसमर्पण नीति को भी बढ़ावा दिया गया है जिसमें नक्सलियों के लिए प्रोत्साहन राशि व रोजगार की सुविधा दी गई है ।

आगे – भले ही सरकार ने नक्सलवाद से निबटने को कई कदम उठाएं हों लेकिन अब भी इसमें बड़ा सफ़र तय करना बाकी है । विकास कार्यों की सरल पहुँच व नीतियों का सही क्रियान्वयन जरूरी है । वहीं हमारे पुलिस व जवानों के लिए नई तकनीक व ख़ुफ़िया तंत्र को मजबूत करने की जरूरत है जिससे भविष्य में बड़ी दुर्घटनाओं से बचा जा सके । इसके अलावा सबसे ज़रुरी है कि सरकार नक्सलियों , आदिवासी , वंचितों तक यह संदेश पहुंचाए की पुलिस व सरकार आदि उनकी हितैषी है न की दुश्मन , और बन्दूक किसी समस्या का हल नहीं बल्कि समस्या को बढ़ाना है ।

जानिएं क्या है प्रोमोशन में आरक्षण और इससे जुड़ा पूरा विवाद …

ऐसा माना जाता रहा है कि किसी भी मुद्दे का एक अंत या समाधान ज़रूर होता है । लेकिन देश में आरक्षण एक ऐसा सदाबहार मुद्दा है जो हमेशा ही अलग अलग स्वरूप , संशोधन या फैसलों की वजह से चर्चा में बना ज़रूर रहता है ।

  • सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया की प्रोमोशन में आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है ।
  • देश में वर्तमान में सचिव स्तर पर सिर्फ 4 अधिकारी SC – ST वर्ग से आते हैं ।

चाहे आरक्षण को जारी रखने या ख़त्म करने की बात हो या समय के साथ – साथ अन्य जातियों द्वारा आरक्षण की मांग या फिर 10% सवर्ण आरक्षण।  ये सभी चर्चा में बने रहें है । हाल ही में इन मुद्दों के साथ प्रमोशन में आरक्षण भी एक नए अध्य्याय के रूप में जुड़ गया है ।

यूं तो प्रोमोशन में आरक्षण का विवाद वर्षों पुराना है। लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने 2012 ने उत्तराखंड सरकार द्वारा दायर याचिका में फैसला सुनाते हुए निर्णय दिया की प्रोमोशन में आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है। इसे लागू करना या न करना राज्य सरकार के विवेक पर निर्भर है । इस फ़ैसले के बाद से ही यह मुद्दा फिर से गर्म हो गया है ।

इस मुद्दे की शुरुआत की बात करें तो यह सन् 1973 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रमोशन में आरक्षण देने शुरू हुआ था।  साल 1992 में इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया था । इसके बाद साल 1995 में केंद्र सरकार ने 1995 में आरक्षण के पक्ष में 82वां संविधान संशोधन किया था । वहीँ 2002 में 85वें संशोधन द्वारा इसमें वरिष्ठता को भी जोड़ दिया गया ।

2006 में इसके ख़िलाफ़ दायर याचिका ( नागराज vs भारत सरकार ) पर फ़ैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे सही ठहराया। लेकिन इसके लिए SC – ST को समाज व शिक्षा में पिछड़ा होना , पदों पर प्रतिनिधित्व न होना , व प्रशासन चलाने में बाधा न पड़ने को जरूरी बताया ।

2012 में उत्तराखंड PWD भर्ती में इस आरक्षण के न होने की वजह से यह मुद्दा हाई कोर्ट पहुंचा जहाँ कोर्ट ने क़ानून बनाने की सलाह दी । इसके बाद 7 पार्टियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया था । वहीँ 2018 में आरक्षण के मुद्दे से जुड़े जरनैल सिंह बनाम लक्ष्मी गुप्ता वाद में सुप्रीम कोर्ट ने पदोन्नति में आरक्षण में SC-ST के पिछड़ेपन के डाटा की ज़रूरत को ख़त्म कर दिया था ।

वर्तमान परिस्थिति – कोर्ट के फैसले के अनुसार संविधान का 16 (4) व 16 (4) (अ) SC – ST को प्रोमोशन में आरक्षण का अधिकार तो दिया है लेकिन इसका फ़ैसला राज्य सरकारें ही करेंगी ।
प्रोमोशन में आरक्षण के पक्ष में लोगों का कहना है कि अब भी नौकरियों में ऊपरी स्तर पर काफ़ी पक्षपात है। इस कारण वहां SC – ST वर्ग का प्रतिनिधित्व काफ़ी कम है । उदाहरण के तौर पर देश में सचिव स्तर पर सिर्फ 4 अधिकारी SC – ST वर्ग से आते हैं । वहीँ यह वर्ग अब भी समाज में बड़े स्तर पर भेदभाव का शिकार हैं ।

वहीँ इसके विपक्ष में लोगों का तर्क है की पहले से समान स्तर पर मौजूद लोगों में यह आरक्षण भेदभाव पैदा करने का काम करेगा।  इससे प्रशासनिक दक्षता पर भी प्रभाव पड़ेगा ।

आगे की राह — पदोन्नति में आरक्षण भविष्य में एक बड़े विवाद की स्थिति उत्पन्न कर सकता है । देश में आरक्षण लाने का मूल मकसद समानता को बढ़ावा देना था जो की 72 सालों में अब तक ढ़ंग से सफ़ल नहीं हो पाया है । इसलिए समय की यह मांग दिखती है कि देश में आरक्षण की गहन समीक्षा कर इसे परिणामोन्मुखी बनाया जाए । वहीँ समाज में समानता व एकरूपता को बढ़ावा देने हेतु नए विकल्पों की भी तलाश की जाए ।

जानिएं दुनिया तथा भारत पर क्या होगा ब्रेग्जिट का प्रभाव ।

ब्रिटेन के यूरोपियन यूनियन से अलग हुए यूँ तो कई महीनें हो गए हैं। लेकिन इसकी प्रक्रिया को लेकर कई बार यह चर्चा में बना रहता है । जानकार अब भी इससे होने वाले प्रभावों का आंकलन कर रहें हैं ।

  • ब्रिटेन 31 जनवरी की रात यूरोपियन यूनियन से अलग हो गया था ।
  • 800 से 900 भारतीय कंपनियों का मुख्यालय लन्दन में है ।

ब्रेग्जि़ट मुद्दे पर 2016 के जनमत संग्रह के बाद से शुरू हुई कोशिशों और कई राजनितिक घटनाक्रमों के बाद ब्रिटेन आख़िरकार 31 जनवरी की रात यूरोपियन यूनियन से अलग हो गया था । ब्रिटेन के पीएम बोरिस जॉनसन ने इसे एक नए युग की शुरुआत बताया था । वहीँ विश्लेषकों द्वारा इससे पड़ने वाले क्षेत्रीय व वैश्विक प्रभावों और नफ़े नुक़सान का आंकलन लगाते रहतें हैं ।

यूं तो ब्रेग्जिट का मामला केवल ब्रिटेन और ई.यू के बीच का था लेकिन इसका राजनैतिक व आर्थिक प्रभाव दुनिया पर भी देखने को मिलेगा ।

ई.यू पर प्रभाव – ब्रिटेन जैसे विकसित और महाशक्ति देश के अलग होने के बाद यूरोपियन यूनियन की ताकत/प्रभाव में कमी देखने को मिलेगी । UN में अब इसका एक स्थायी सदस्य देश कम हो जाएगा । वहीँ संयुक्त GDP में भी बड़ी कमी आएगी । अब ब्रिटेन ई.यू को सालाना 9 अरब डॉलर देने को बाध्य नहीं होगा। फ्री वीजा,  FTA की सुविधा समाप्त होने के बाद इ.यू के अन्य देशों को यात्रा, व्यापार आदि पर नए टैक्स व नियम लगेंगे । इसके अलावा अब ब्रिटेन ई.यू के कानूनों को मानने को बाध्य नहीं होगा । जिन मुद्दों पर ब्रिटेन इस संघ से अलग हुआ हैं उन मुद्दों पर अब अन्य देश भी आवाजें तेज़ कर सकते हैं ।

ब्रिटेन पर प्रभाव – जानकारों की माने तो शुरूआती अवस्था में पौंड में गिरावट देखने को मिल सकती है। वहीं ब्रिटेन की  GDP में भी 1 से 3 % तक की गिरावट हो सकती है । कई कंपनियां जिनका मुख्यालय लंदन में था वे पलायन कर सकती हैं । वहीँ अब ब्रिटेन ई.यू के अन्य देशों के साथ मुक्त व्यापार से वंचित हो जाएगा ।

लेकिन भविष्य व फायदे की बात करें तो अब ब्रिटेन अपने हिसाब से नई नीतियां बनाने और वैश्विक व्यापार संबंध बनाने को स्वतंत्र है । भारत, अमरीका जैसे बड़े देशों के साथ अब वह नए व मनमुताबिक समझौते कर सकेगा । वहीँ ब्रिटेन को विनिर्माण उद्योगों के शुरू होने व नए टैक्स आदि से रोज़गार व कमाई आदि में भी फायदा देखने को मिल सकता है ।

विश्व और भारत पर प्रभाव – भारत तथा अन्य देशों के लिए ब्रिटेन यूरोपियन यूनियन का दरवाजा हुआ करता था । लंदन को इ.यू की आर्थिक राजधानी भी कहा जाता था । लेकिन अब वो दरवाज़ा बंद हो जाएगा और अन्य देशों की कंपनियों को अब ब्रिटेन और ई.यू में अलग – अलग नियम – कानून व टैक्स का पालन करना होगा ।

भारत की बात की जाए तो लगभग 800 से 900 भारतीय कंपनियों का मुख्यालय लन्दन में है। लेकिन उन्हें भी अब अलग अलग टैक्स भरने पड़ेंगे । भारत ब्रिटेन को निर्यात ज्यादा करता है लेकिन ब्रिटेन में उद्योगों के शुरू होने के बाद इसमें कमी आ सकती है । हालांकि भारत और ब्रिटेन के बीच FTA पर भी बात हो सकती है जिससे भारत को फायदा मिलने की उम्मीद है । ब्रिटेन भारत में तीसरा सबसे बड़ा निवेशक है । उम्मीद है आगे चल कर इसमें और ज्यादा बढ़त देखने को मिलेगी जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को बल मिलें ।

अमेज़न और बुशफायर की आग

साल 2019 जलवायु संकट की नज़र से काफ़ी बुरा साल साबित रहा । अगस्त महीने में दुनिया के सबसे बड़े जंगल अमेज़न में आग लगी। तो वहीँ साल के अंत में ऑस्ट्रेलिया मे बुशफायर की भयानक आग की वजह से अनगिनत पशु पक्षियों जीव जंतुओं की मौत हो गई ।

  • अमेज़न जंगल अकेले पूरी दुनिया में 20 % ऑक्सीजन का योगदान देता है ।
  • बुशफ़ायर में लगभग 50 cr से ज़्यादा जीव – जंतु मारे गए और 28 नागरिकों / कर्मचारियों की भी मौतें हुई ।

ध्यान देने वाली बात है कि कई विशेषज्ञों और जानकारों ने इस आग को प्राकृतिक नहीं बल्कि मानवनिर्मित दुर्घटना की संज्ञा दी है । इसका प्रमुख कारण दुनिया में जलवायु परिवर्तन की समस्या है । अमेज़न की जंगलों में लगी आग का एक कारण बड़े स्तर पर पेड़ो की कटाई को बताया गया है। इस आग को लेकर ब्राजील के राष्ट्रपति बोलसेनारो को काफी आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा । बोलसेनारो शुरू से ही अमेज़न के जंगलों की कटाई और उसके संसाधनों के दोहन के हिमायती रहें हैं ।

यह जंगल ब्राजील के 40 % भाग में फैला है और अकेले पूरी दुनिया के 20 % ऑक्सीजन का योगदान देता है । जंगल में आग  कई बार लगती रही है। लेकिन साल 2018 के मुकाबले 2019 में आग लगने की 72 हज़ार से ज्यादा घटनाएं हुई हैं।  इस कारण बार – बार सरकार पर उँगलियां उठ रहीं हैं ।

वहीं ऑस्ट्रेलिया बुशफायर की बात करें तो वहां भी आग लगने का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन ही रहा । 2019 में देश में इतिहास का सबसे बड़ा सुखा पड़ा और शुष्क हवाओं ने भी आग फ़ैलाने में मदद की । इस आग में लगभग 50 cr से ज़्यादा जीव – जंतु मारें गएं और 28 नागरिकों / कर्मचारियों की भी मौतें हुई । ऑस्ट्रेलिया के पीएम स्कॉट मोरिसन को भी इसके लिए काफी आलोचनाएं झेलनी पड़ी। देश से कार्बन उत्सर्जन टैक्स को ख़त्म करने को लेकर भी उनकी आलोचना हुई ।

इस घटना के असर की बात करें तो इसने एक बार फिर से दुनिया का ध्यान जलवायु संकट की तरफ़ खींच लिया है । जिसपर दुनिया में कई बड़े सम्मलेन और बातें होती तो आई हैं लेकिन उनका असर ना के बराबर दिखा है।

अब तक 1991 में रियो का जलवायु सम्मलेन  , 1997 का क्योटो प्रोटोकॉल व 2015 का पेरिस जलवायु संधि हुई हैं। इन सब में कई फैसले और कदम उठाएं गएं। लेकिन अमरीका जैसे बड़े देशों के समझौते के बाहर होने और अन्य देशों की सुस्ती से इसका व्यापक असर पड़ता नहीं दिखा है ।
भारत तथा अन्य कई देश अपने कार्बन उत्सर्जन में कमी कर रहें हैं। लेकिन वैज्ञानिकों का दावा है कि पृथ्वी के तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक नियंत्रित रखने का लक्ष्य अब नामुमकिन हो गया है । वहीँ पेरिस संधि से अमरीका के बाहर होने के बाद होने वाली आर्थिक दिक्कतें भी इस लक्ष्य को प्राप्त करने में मुश्किल पैदा करेगी ।

भले ही 1.5 डिग्री का लक्ष्य अब नामुमकिन सा हो गया हो, लेकिन अब भी दुनिया में प्रयासों को और ज़्यादा तेज़ी देने की ज़रूरत है । अधिक से अधिक वृक्षारोपण कर के , कार्बन उत्सर्जन व प्रदूषण कम से कम रख के और पर्यावरण के प्रति जागरूकता फ़ैलाकर स्थिति को अब भी बेहतर किया जा सकता है ।

देश के किसानों की समस्याएं और सरकार के कदम…

ऐसा माना जाता है की हर समस्या का कभी न कभी कहीं न कहीं एक समाधान जरूर होता है । लेकिन यह बात देश के किसानों के परिपेक्ष्य में काफ़ी गलत साबित होती दिखाई पड़ती है ।

  • एनसीआरबी के डाटा के अनुसार बीते 2 दशकों में 3.2 लाख किसानों ने आत्महत्या की है ।
  • इस साल के बजट में  कृषि के लिए 1.60 लाख करोड़ के पैकेज का ऐलान किया हैं ।

देश में शायद ही कोई समस्या किसानों की समस्या जितनी स्थायी और टिकाऊ होती है । “जय जवान जय किसान जय विज्ञान ” के उद्घोष के बीच देश ने अब तक काफी विकास कर लिया है । लेकिन किसानों के हालात में निरंतर गिरावट ही देखी गई है ।
एक दौर में अकाल और भुख़मरी से जूझते भारत को किसानों ने अपनी मेहनत और लगन से बेहतर स्थिति में ला दिया ।लेकिन आज वही किसान अपनी बद्तर हालत की वजह से आत्महत्या करने को मज़बूर है ।
बाढ़ – सूखा , कम उपज ,फसलों के कम दाम और कर्ज व ब्याज ने किसानों की कमर तोड़ दी है ।
एनसीआरबी के डाटा के अनुसार बीते 2 दशकों में 3.2 लाख किसानों ने आत्महत्या की है । बढ़ती बदहाली से तंग आ कर किसान कई बार समय – समय पर आंदोलन भी करते रहतें हैं ।

सरकार ने इन समस्याओं को सुलझाने के लिए कई कदम उठाएं हैं । पीएम किसान सम्मान निधि , पीएम कृषि सिंचाई , इ नाम , केसीसी , फसल बीमा योजना जैसे कई कदम उठाए गएं हैं।
वहीँ राज्य सरकारों द्वारा भी कई योजनाएं और कर्ज़ माफ़ी जैेसे कदम उठाएं जाते रहें हैं । इस साल के बजट में भी कृषि के लिए 1.60 लाख करोड़ के पैकेज का ऐलान किया गया हैं । किसान रेल व किसान उड़ान योजना का ऐलान हुआ है जिससे परिवहन को तेज़ व सुगम बनाकर फसलों को खराब होने से बचाया जा सके । वहीँ किसानों के लिए एक 16 पॉइंट्स स्कीम का भी ऐलान हुआ है ।

लेकिन सरकार को इन क़दमो के अलावा अब भी कई और कदम उठाने की जरूरत है । जैविक कृषि को प्रोत्साहन , कांट्रेक्ट कृषि को बढ़ावा , बैंक ऋण को सरल बनाना , MSP में बढ़ोत्तरी और बाढ़ सूखे से निजात दिलाने के लिए नए कदम उठाने की जरूरत है । इसके अलावा समय की मांग है कि स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों को लागू किया जाए। इसमें भूमि सुधार , कृषि को समवर्ती सूची में लाने , MSP को 1.5 गुना तक बढ़ाने जैसी कई बातें कही गई हैं ।

केंद्र सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए लगभग 14.86 % प्रतिवर्ष कृषि दर की ज़रूरत है।  लेकिन वर्तमान में यह दर 2.9% है , जिससे यह लक्ष्य लगभग नामुमकिन सा लगता है । लेकिन अगर सरकार उपरोक्त उपाय और सुधारों को अपनाती है तब भी किसानों की स्थिति में काफी सुधार हो सकता है ।
बदहाल स्थिति के कारण अब बड़ी संख्या में किसान कृषि छोड़ रहें हैं ।  ऐसे में समय की मांग है कि किसानों की स्थिति में सुधार हेतु क़दमों को प्राथमिकता दी जाए।  क्योंकि अन्नदाता की संपन्नता कहीं न कहीं सीधे  देश की संपन्नता से जुड़ी है ।

अमरीका ईरान तनाव और भारत

वर्ष 1979 में हुए ईरानी क्रांति से शुरू हुआ अमरीका – इरान संबंधों के बुरे दौर वर्तमान मे अपने चरम सीमा पर पहुंच गएं हैं । साल के शुरुआत मे हुए एक अमरीकी मिसाईल हमले में ईरानी कुर्द सेना के प्रमुख कासिम सुलेमानी की मौत के बाद से पूरे मध्य पूर्व मे संकट के बादल छाए हुएं हैं ।

  • तनाव के बीच ईरान ने अपनी सैन्य शक्ति को बढाना शुरु कर दिया है।
  • अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने किसी उकसावे वाली हरकत पर ईरान के जहाजों को खत्म कर देनें का आदेश दिया है।

कासिम सुलेमानी की मौत  के बाद ईरान ने ईराक स्थित अमरीकी सैन्य बेसों पर अनगिनत राकेट दागे।  तनाव बढने की स्थिती मे होर्मूज़ की खाडी को बॅंद करने की भी धमकी दे डाली । तो वहीं इसके जवाब मे अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी किसी भी उकसावे वाली हरकत पर ईरान के जहाजों को  खत्म कर देनें का आदेश दे दिया ।

इससे पहले भी अमरीका ने ईरान के साथ हुई परमाणु संधि को तोड़ कर ईरान के ऊपर नये आर्थिक – व्यापारिक प्रतिबंध लगा दिएं थे । अमरीका ने अपने सहयोगी देशों को भी ऐसे करने और न करने पर अंजाम भुगतने की धमकी दी थी । इसकी वजह से ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई और उस पर कोरोना की दोहरी मार पड़ी । कुछ ही समय पहले अमरीका ने ईरान रिवाल्यूशनरी गार्ड्स को भी एक आतंकी संगठन घोषित कर दिया था। अमरीका ईरान पर छुप कर परमाणु व मिसाईल कार्यक्रम चलाने व यमन , लेबनान जैसे देशों में आतंकी संगठनों को मदद देने का आरोप लगाता रहा रहा है ।

इस तनाव के बीच ईरान ने अपनी सैन्य शक्ति को बढाना शुरु कर दिया है जिससे पूरे मध्यपूर्व मे एक भय का माहौल बना हुआ है । इसी बढ़ते खतरे का नतीज़ा है की अब मध्यपूर्व के कई अन्य देश अब एक नए गठजोड़ की संभावनाएं तलाशने लगें हैं ।

भारत पर प्रभाव – इस तनाव का भारत पर प्रभाव की बात करें तो भारत के लिये एक असमंजस की स्थिती है । अमरीका और ईरान दोनों ही भारत के मित्र देश हैं । ईरान भारत का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश है। भारत यह खरीदारी रूपए व अनाज दोनों माध्यमों से करता था।  लेकिन अब अन्य देशों से तेल का आयात करने पर भारत को घाटा होने की उम्मीद है।  भारत और ईरान बड़े साझेदार रहें हैंं लेकिन वर्तमान परिस्थिति दोनों देशों के रिश्तों में दरार पैदा कर सकती है ।इससे चाबाहार बंदरगाह जैसे कई प्रोजेक्ट पर भी ख़तरा मंडरा सकता है ।

हाल ही में ईरान के राजदूत ने भी भारत को एक महाशक्ति बताया लेकिन अपनी रीढ़ सीधी करने की सलाह दे डाली । उन्होंने यह भी अपील की कि भारत चाहे तो ईरान ओर अमरीका के बीच समझौता करवा सकता है । ऐसे में देखा जाए तो भारत के पास एक बेहतर मौका है जिससे वह अपने आर्थिक नुकसान को भी बचा सकता है और दुनिया में अपनी शक्ति का लोहा भी मनवा सकता है ।