Saturday, June 15, 2024

क्या वर्तमान समय में ख़त्म हो रही है दल बदल कानून की प्रासंगिकता ?

हाल के कुछ वर्षोंं में देश की राजनीति में जनता द्वारा चुने जा रहे प्रतिनिधियों के द्वारा बड़े स्तर पर दल बदलने की घटनाएं आम हो गई हैं । इन घटनाओं ने  देश “आया राम गया राम” की कहावत को एक बार फिर से चरितार्थ करना शुरू कर दिया है ।

  • संसद ने साल 1985 में 52वें संविधान संशोधन द्वारा दल बदल विरोधी कानून पारित किया था ।
  • 1999 में विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट में गठबंधन पार्टियों को भी इस कानून के दायरे में लाने की सलाह दी ।

देश में एक बार फिर से चुनाव आने वाले हैं , लेकिन चुनाव के साथ ही इस बार कई सीटों पर उपचुनाव भी होंगे जिसका प्रमुख कारण कई प्रतिनीधियों द्वारा दुसरे पार्टियों में चले जाने के कारण सीटों का रिक्त होना है । अपने निजी हितों के लिए दल बदलने की कुप्रथा गलत तो है हीं और तो और एक तरीके से यह जनता के साथ सीधे सीधे धोख़े सा प्रतीत होता है । इसके अलावा इससे राजनितिक संकट , पैसों की बर्बादी और विकास कार्यों में रुकावटें भी पैदा होती हैं ।

दल बदल कानून — इस स्थिति से बचने के लिए ही देश की संसद ने साल 1985 में 52वें संविधान संशोधन द्वारा दल बदल विरोधी कानून पारित किया था । इस कानून के अनुसार किसी प्रतिनिधि को अपने राजनितिक दल की सदस्यता छोड़ने , निर्दलीय होते हुए किसी दल में शामिल होने , सदन में पार्टी के खिलाफ वोट करने या वोटिंग में भागीदारी न करने पर आयोग्य घोषित किया जा सकता है ।
इसके अलावा अगर किसी मनोनीत सदस्य के द्वारा भी 6 महीनें की समाप्ति के बाद किसी दल की सदस्यता ली जाती है तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है । लेकिन किसी पार्टी के 2/3 विधायको के दल बदलने और विधानसभा अध्यक्ष के अपनी पार्टी से इस्तीफा देने के मामले को अपवाद रखा गया है । सदस्यों के अयोग्यता का फैसला अध्यक्ष ही करते हैं ।

असर — इस कानून के पारित होने के कुछ वक्त तक इसका असर देखने को मिला लेकिन समय गुज़रने तथा कानून पुराने होने के साथ साथ वही पुराने संकट नये रूप में फिर से सामने आने लगे हैं ।
इस कानून से कई बार राजनितिक संकटों से छुटकारा तो मिला लेकिन कई बार पार्टियों के द्वारा इस कानून की मदद से पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र को कुचलने की घटनाएं सामने आती रही । कई बार पार्टी लाइन से अलग राय रखने वाले तथा आवाज उठाने वाले सदस्यों को इसका शिकार बनाया जाता रहा है । यह कहना बिलकुल सही होगा की जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि के ऊपर पार्टी के विचार हमेशा भारी पड़ते हैं । दुनिया के अनेक लोकतंत्रों में पार्टीयों के सदस्य अपने पार्टी के खिलाफ़ काफ़ी मुख़र होते हैं फिर भी पार्टी में बने रहते हैं । इसके अलावा भारत में कई बार अध्यक्ष की निषपक्षता पर भी सवाल उठते रहतें है जिस कारण सदस्य कोर्ट का रुख करतें हैं ।
वर्तमान समय में सरकारों पर संकट और सदस्यों को निशाना बनाना दोनों घटनाएं आम हो गयी हैं जिसके खिलाफ कई बार विवाद खड़े होते रहतें हैं ।

सुधार की मांग — इन समस्याओं पर 1990 में बनी दिनेश गोस्वामी समिति व चुनाव आयोग का मत है कि प्रतिनिधियों को अयोग्य ठहराने का आ़ख़िरी फै़सला चुनाव आयोग की सलाह से राष्ट्रपति और गवर्नर के पास होना चाहिए । वहीँ 1999 में विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट में गठबंधन पार्टीयों को भी इस कानून के दायरे में लाने की सलाह दी थी ।  केवल संकट के समय पार्टी के पक्ष में वोट न करने पर सदस्यों को अयोग्य करार देने की सलाह दी थी । इसके अलावा अयोग्य ठहराए जाने की अवधि को भी बढ़ाने की सलाह दी थी जिससे सदस्यों के मन में अपने स्वार्थ के लिए राजनीतिक संकट पैदा करने के खिलाफ डर बैठाया जा सके ।

दल बदल विरोधी कानून देश को राजनीतिक अस्थिरता से बचाने व कई अन्य बेहतर उद्देश्यों के लिए लाया गया था । लेकिन वर्तमान परिस्थिति देखें तो इसमें विद्यमान कमजोरी का पार्टी तथा सदस्य दोनों ही अपने स्वार्थ के लिए प्रयोग करतें हैं । इसलिए वर्तमान समय की जरूरत है कि इसमें शामिल विसंगतियों को दूर किया जाए जिससे भारत के लोकतंत्र को और बेहतर बनाया जा सके ।

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